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Thursday, May 26, 2011

कभी यहाँ भी एक बस्ती बसती थी....!!



कल जो बस्ती गिराई गई उस बस्ती में मेरा कोई नहीं था|
औरतें बच्चें बूढ़े और कई लोग जिनके सर पर इस झुलसती धुप के सोले गिर रहे थे उन मेसे मेरा कोई नहीं था।

स्कूल जो कभी कच्चा-पक्का था,जो बनते बनते इक मोल बनकर कई बच्चों का जीवन झुलसा गया उनमे से मेरा कोई नहीं था । में तो कोंनवेंट स्कूल मे पढ़ा था |

उन स्कुल में,मैं या मेरे घर से कोई कभी पढने न गया है और न ही जायेगा क्या पता उनका स्टान्ड्रड देख हम लोग लज्जा जायेंगे|

उस ओर जिस ईमारत की नीव खोदते खोदते अपनी कबर खोद खुद दफ़न हो गया उन मजुरो में मेरा कोई नहीं था मैं तो अपने आलिशान बंगले मे ऐ.सी.ओन कर के आराम से सोता हुं |

मेरी कोई दुकान कभी नहीं टूटी , मेरा कोई घर कभी नहीं टुटा मैं तो बस दूर से दुसरो के घर को टूटते देखता रहा और देखता रहता हुं।

ये सब ख्याल मेरे दिमाग मे चल रहे थे तभी कहीं अचानक से मेरा दिल जोर से धड़का जैसे मुझसे बोला तू क्यूँ बेकार का परेशान होता है इन सब मैं कहाँ कोई तेरा था जो इतना मायूस होता है|

Monday, May 9, 2011

सपनो की रानी



लिखना चाह्ता हुं तुझे प्यार भरे खत ऐ सपनो की रानी बता तुझे कैसे लिखुं?
हर सुबह तुझे ही देखना चाह्ता हुं ऐ मेरे सनम तु ही बता कैसे तुझे देखुं?
हर बात पर करना चाहता हुं तुझे याद है तुझे भी पता मेरे पास तो तेरी कोई याद भी नही।

जाने किस फुलों की तरह मुस्काती है तु, न जाने किस दिन के चांद की तरह है तेरी सुरत? मेरे पास तो तेरी कोई तस्वीर ही नहीं । न जाने किस शबनमी रात की तरह है तेरे आंसू मेरे पास तो तेरे कोई गम भी नहीं।

कया तेरे सुख पर किसी के प्यार का घुंघट पडा है या मेरी तरह तु भी तलाश रही है कोई प्यारी सी छांव। क्या तेरा भी है कोई सपनों का राजकुमार है या की मेरी तरह तेरा भी कोई सपना ही नहीं।

मुझे कुछ भी मालुम नही की कौन है तु? कहां है तु? कैसी है तु? तेरे बारे मे हर तरह से अनजान हुं मै। और क्या कहुं तेरे गुलाबी होठों के निकट सिर्फ़ बेजुबान हुं मै।

न मेरे पास तेरा कोई निशां है न तेरे पास मेरा, तेरे लिये तो सिर्फ बेनिशान हुं मै। ऐ सनम अब तु ही बता कैसे तुझे पुकारूं? किन सितारो में तुझे निहारूं ? किन हवाओं से पुछुं तेरा नाम तेरे लिय्र अब तो सिर्फ़ गुमनाम हुं मै।
बस छ्म छ्म करती आ जाओ मेरे जीवन मे मेरे पास तुम्हारे सिवा कुछ भी नहीं।

Thursday, April 14, 2011

आखरी ख़त...



आज का आखरी ख़त सोचा लिख ही दूँ कल फिर ये सुबह मिले न मिले,

गरीबी ,भूख , भ्रष्टाचार से दबे देश का दुःख देख लगता है की कहीं ये मुझे अपने आप से ही बागी न कर दे| यहाँ हर रोज कोई न कोई जुलम की छाहं में दम तोड़ता है ,हर रोज यहाँ न जाने कितने निर्दोषों का लहू सडको पर पानी की तरह बहता है| इन घट्नाओं को देख सदा डर लगा रहता है की कहीं मेरे विचार मुझ से ही बगावत न कर दे|
न जाने कितनी चूड़ियाँ टूटती है इस देश की नंगी सडको पर न जाने कितने हाथो में महेंदी कभी रंग लाती ही नहीं|

आये दिन अखबारों मे दिख जातें हैं दबी,कुचली,लटकी लाशो के फोटो, इन फोटो से किसी का दिल पसिजता हो की न हो लेकिन मेरा दिल विचलित हो जाता है और ये डर लगता है की कहीं मेरा दिल धड़कना ही न छोड़ दे |
हर रोज नसे में झुलसती है कई युवको की जिंदगीयां कही ये झुलसन मेरे देश के नौजवानों को नसेड़ी ही न कर दे ?

हर सुबह होते ही किसी न किसी का कोई न कोई द्वार सुना हो जाता है हर आंगन मुझे सिसकता दिखाई देता है, क्या करूँ ? क्या करूँगा ? यही सोच हर दिन बस चुपके से मरता रहता हुं | क्या यही मेरा फर्ज है ? क्या सब कुछ देख चुपचाप सहन करना ही मेरे फर्ज की ललकार है? मैं खुद किसी का हमराह हुं या गुमराह हुं यही तय नहीं कर पाया तो अब इस देश को क्या रस्ता दिखाऊंगा ?

इसी लिए ऐ देश सोचा आज तुझे आखरी खत लिख ही दूँ शायद कल मैं भी भ्रष्ट हो ही जाऊं ?आज दिल दहलता है तो टकरा जाऊं हर जुलम की तलवार से कल कहीं मेरा खून ठंडा न पड जाए ? ऐ वतन तेरी सन्दली बाँहों की कसम अगर इस जिंदगी मे अपने दम पर जिंदा लौट आया तो फिर एक नया भारत जरूर बसाऊंगा| फिल हाल तो यही सोच रहा हुं इस आखरी ख़त को किसे भेजुं , खुद ही पढुं, या फिर जला कर इस की राख खुद ही पी जाऊं |

जाते जाते:
मैं कोशिश करना चाह रहा था कि गिरते हुये इक पेड को रोकुं, कमबख्त जब तक जेह्न मे ये विचार आया तब तक लोग उसे पहुंचा चुके थे कारखाने में।

Saturday, February 26, 2011

उम्मींदो का आसमां


मैं चला था ईक नया जहां बनाने अपनी उम्मींदो का नया आसमां बनाने, मुझे कहां पता था यहां आसमानो के भी ठेकेदार होतें हैं जिन पर घमंड के बाद्ल छाये होतें हैं। किन्तु इनपर घमंड से सनी धनक कौन चढ के साफ़ करे, “ज्ञान-रूपी” अभिमान के इनको जालें लग चुकें हैं, रुपयों की श्याही का ईनको ठप्पा लग चुका है। कोई अगर उसे मिटाने की कोशिश भी करता है तो अभिमान की गर्द उड्ने लगती है।

वो अपना फ़लक खोल परिवर्तन की लहर को महसुस नही करना चाह्ते है,कहीं नाकामी की धुप जलाकर राख न कर दे। पुरातन विचारो के इतने पत्तों ने घेरा हुआ है इन्हे की शाखों पर बद्लाव के परिंदे बैठ्ते ही नहीं ( य़ा बैठ्ने नही देना चाह रहें है)।

अब कैसे उम्मीद पालुं, कैसे खोलुं दिलों के राज, कैसे उडाऊं अपनी आशाओं के परिंदे, यहां तो हर डाल पर बैठा है शैयाद । मुझे फ़िर लौट कर चले जाना है इक अनंत यात्रा पर ये मालूम है, क्या करे जालिम ये दिल ही नही मानता के हर वख्त कि इक शाम होगी ऐसे लोगों कि खास जिंदगी भी कभी आम होगी।
ये तो मेरी बे लगाम ख्वाहिशें हैं जो मुझे दौडाती रहती हैं, वर्ना कौन चाहता है सुरज के चमकीले उजालों में अंधेरे की नाजायज औलादें ढुंढ्ना।

दुख तो हमेशा मुझे यही रहेगा की वो हमे समझते ही नही, हो जातें है बेववजह हमसे खफा उन्हे महसुस होता है शायद मैं यहा कुछ लेने आया हुं, उन्हे कौन बताये सनम मैं यहां तो क्या कहीं भी कुछ लेने आया ही नही था।
ऐ आसमान के ठेकेदारो अब तो समझो, आप की खातिर तो हमने अपनी उम्मींदो का आसमां लुटा दिया, क्या मिलेगा हमे चंद चमकीले से शीशे तोड के ।

Wednesday, February 9, 2011

एक्सटर्नल अफेर



मेरे एक दोस्त के प्रश्न ने मुझे बैचेन कर दिया है ईन दिनो। ये प्रश्न है...
क्या एक परणित स्त्री और परणित पुरुष मित्र नहीं हो सकते?

मैं क्या कहता ? मैं कोई ज्ञानी ,महात्मा ,या साधु तो हुं नहीं जो हर जगह अपनी ’ज्ञान-वाणी’ बाटता फिरुं| फिर भी मन बैचेन हो रहा था की आखिर इसका क्या जवाब देना चाहिए?
मैंने गुजरात के एक बहोत ही चर्चित लेखक चंद्रकांतबक्षी का एक लेख पढ़ा था। जिस मे उन्हों ने कहा था की “एक स्त्री और पुरष कभी मित्र नहीं हो सकते है ? यदि वो दावा करते हैं के वो अच्छे मित्र है तो या तो वो झूठ बोल रहे है, या फिर उनमें कोई रिश्ता नहीं है”| इस विधान से मैं सहमत हो जाउं या नही, ईसी पसो पेश मे मैं कब से चल रहा था। चलिए अब इस पर अपनी ’ज्ञान-सरिता’ बहाने की कोशिश कर के देखता हुं। ( जैसे की आज कल ’ज्ञानीलोग’ न्यूज़ चेनलो पर’ जा के करते हैं) ? शायद जवाब मिल जाये।

मैं यहाँ कोई गर्लफ्रेंड या बॉय फ्रेंड की बात नहीं कर रहा हुं, और न ही कोई लफ़डेबाजो की बात करने वाला हुं| मैं यहाँ एक रिश्ते की बात करने की कोशिश करना चाह रहा हुं।इसी रिश्ते की बात से संबधीत एक बात याद आ रही है, एक बहुत ही मश्हुर पत्रकार को किसी ने पुछा था की "आप के और आप की चेनल के एंकर के बिच में क्या लफड़ा है?जब की आपकी तो शादी हो चुकी है। जवाब में उन्हों ने कहा की " मेरे और उसके बिच में एक रूहानी रिश्ता है, हम दोनों के बिच एक डीप रिलेसन शिप है”|

जहाँ तक मेरा मानना है वहां तक मैं ऐसे रूहानी रिश्तों को शादी से कम पवित्र नहीं मानता । समाज को भी ऐसे रिश्तो को स्वाभाविक तौर पर स्वीकार कर ही लेना चाहिए , नहीं तो आने वाले दिनों में समाज नाम की पुरी व्यवस्था पर एक सवालिया निशान खड़ा हो जायेगा?वैसे भी पहले के भारतीय दौर मे राजाओं की कई सारी रानिया होती थी, हिदु देवी देवताओ के कई रिश्ते होते थे फिर भी उन्हें आज भी भगवान् ही माना जाता है| उनके खिलाफ कभी किसी ने प्रश्न नहीं खड़े किये? क्यों? ( क्यों की भारतीय समाज दंभ से भरा हुआ है|) पुरे विश्व को "काम-सुत्र" भारत ने दिया फिर भी आज भारत मे सेक्स पर बात करना वर्जित है ( ये बात और है की भारत की आबादी दिन-बा- दिन बढती ही जा रही है|) मेरी ऐसे सभी भारतीयों से अनुरोध है की कृपा करके दंभ छोड़े और परिवर्तन की लहर को महसुस करे | समाज के हरेक रिश्ते को आदर सामान दे|

बात आगे बढातें हैं..जिनके कोई विवाहोतेर संबंध हो ही नहीं शकते ऐसे कई भले मानुसों और सज्जनों को मैंने ऐसे रिश्ते बनाते और बाकायदा पुरे जीवन भर निभाते देखा है| उन्ही को फ़िर बोलते भी सुना है की " क्या होगा इस देश का ? इस समाज का ? आज कल लोग शादी के बाद भी दूसरी औरतो और पुरषों से संबंध कैसे रख सकते हैं? ये देश विनास की तरफ जा रहा है? में ऐसे महापुरषों और स्त्रियो को वंदन कर आगे बढ़ चलता हुं|

ऐसे रिश्तो को देख मेरे मन में एक प्रश्न स्वभाविक हो उठता है की स्त्री पुरुषो को अपने संबंधो को चुपके से शरमाते शरमाते भी निभाना क्यों पड़ता है? क्या प्रेम कोई गुनाह है? कया शादी करने के बाद किसी को कभी प्यार नहीं हो शकता? और क्या एक साथ दो व्यक्तिओं से प्यार नहीं किया जा सकता या निभाया नहीं जा शकता? मेरी निगाह में तो ऐसे प्यार करने वालो को और खुल के समाज के सामने आने वालो को आदर की नजर से देखना चाहिए| ऐसे रिश्ते रखने वालो को जो परेशान करता है या निंदा करता है वो मेरी नजर में एक बलात्कारी है,जो किसी अच्छी चीज को देख कर खुश नहीं हो शकता |( वैसे भी भारत का पौराणिक इतिहास रहा है जब भी कोई हवन करता है तो उस मे हड्डीयां डालने वाले आ ही जाते थे,और वो कौन होते थे ये मुझे बताने जरूरत महसुस नहीं होती आप सब को पता है। आज के समय मे सिर्फ उनका रोल और कार्य बद्ल गया है।) ऐसे कर्म करने वालो का खुल कर विरोध करना चाहिए | और जैसे भारत देश में बक-बक हर कोई करता है किन्तु करता कुछ नहीं वैसे अगर आप में और हम कुछ न कर सके तो ऐसे रिश्तो को कम से कम सम्मान की नजर तो बक्श ही शकते है | अगर ऐसा किया जाये तो वो ही मेरी नजर में सच्चा वलेनटाइन गिफ्ट होगा इस भारतीय समाज को|

अच्छा अब चलता हुं बहोत हो गया ...
जाते जाते इस कहानी के अनुरुप गुलजार साहब का इक शेर सुन लिजीये

कब्रिस्तान है, कब्रिस्तान से आहिस्ता गुजरो, कोई कब्र हिले ना जागे, लोग अपने अपने जिस्मो की कब्रो में बस मिट्टी ओढे दफन पडें है।

सुचना : में शादीसुदा नहीं हुं | मेरा कोई एक्सटर्नल अफेर भी नहीं है|

Friday, December 24, 2010

माँ तरकारी बना रही है…



कांपते हुए हाथ, फटे हुए पन्ने , मरते हुए जजबात, हिलती हुई कलम लिए, उम्र अपनी अब कट रही है खुद को साबित करने में, कौन समझेगा मेरी बेबसी का मतलब, निकला था पत्रकार बनने दलाल बन कर रहगया|
चलिए छोडिये अब इन बेकार की बातों को, आइये आज कुछ समय निकाल कर मेरे साथ,आप को बनते भारत की तस्वीर दिखता हूं...

रात का वक्त है, बहोत ही खामोश सन्नाटा है, कोई साया,सर्गोशी और आहट नहीं है| बस एक मकान की ओर से धीमी सी रोशनी टिमटिमा रही है| फटे हुए खस्ताहाल टाट के पर्दों से चाँद की मनभावन किरणे एक घर में हौले से झांक रही है| छोटे से इस घर में हजारों किस्म के धुंए के बीच जलता, सुलगता हुआ एक छोटा सा परिवार ‘खुशहाल’ दिखाई दे रहा है| कई वर्षो के लगातार इन्तजार के बाद आज इनके घर में चूल्हा जल रहा है, आज इनके घर में ‘तरकारी’ प़क रही है| घर से बहार की ओर सीना ताने भागता हुआ धुआं भी आज अपने आप पर इठला रहा है| आज तरकारी की महक से मुरझाये चेहरोवाले बच्चों की नाक तरकारी की महक से लप-लपा रही है| शायद ये आज गर्व से कह या सोच रहे हैं “अमीरों के घर में तो रोज बनते है पकवान आज हमारी माँ भी तरकारी बना रही है"| इन मासूमों को क्या मालूम आज इनका पिता अपने आप को बेच आया है। बच्चों के पेट की आग मे पत्नी का मंगलसूत्र झोंक आया है। चलिये जाने भी दीजिये इन बोरिंग बातों को आगे चलते है.....

कहीं से आ रही है आरती की आवाजें तो कहीं नेताजी पार्क में चिल्ला-चिल्ला "गरीबी हटाओ"का नारा लगा रहे हैं| कहीं मल्टीप्लेक्सों में लम्बी लाइने लगी है तो कहीं बाइक और मोटर फर्राटे से भागे जा रही है,हर कोई एक अनजानी सी अंधी दौड में शामिल है,पता नहीं कहां जाना है,कब तक ऐसे ही भागते भागते जीवन बिताना है? इन सब भागदौड को नजरअंदाज कर ये बच्चे खुश हैं, आज इनकी माँ ‘तरकारी’ बना रही है|

बनते भारत में लाखों लोगो को ‘सुगर’ सता रही है, वहीं इन लोगों के घर में रखे चीनी के डब्बो ने वर्षों से ‘सुगर’ का एक दाना तक नहीं चखा | बडे-बडे होटलों, बसों ,मेट्रो, से शहर भरा जा रहा है, बढ़ते, फलते-फूलते इसी शहर में इन्होंने खाली पेट ( खली का पेट नहीं) कई रातें गुजारी है| चीज नान, बटर नान,पालक-पनीर,पिज्जा, बर्गर को इन्होंने सिर्फ अपने ख्वाबों-ख्यालों में ही महसूस किया है, और इन नामों का आनंद सिर्फ इनके कानों ने लिया है| बाकी इन्होंने तो कई रातें रोटी के सिर्फ एक टुकडों में गुजारी है| इन सब फ़िजूल बातों का क्या मतलब, आज तो इनकी माँ ‘तरकारी’ बना रही है|

बहुत ज्यादा हो गया, आँखे बंध करिए चुपके से मेरे साथ आप भी आगे बढ़ चलिए. ..

चमचमाती हुई पानों की दुकानें, दिन-ब-दिन बनते फ्लाय-ओवर, बढ़ते हुए मोल जहाँ हर समय खरीदारों का मेला लगता है, वहीं एक अंधियारे से कोने मे झांकती चाँद की किरणे हरदिन इन मासूम से बच्चों को चिढ़ाने आती थी, आज इन बच्चों को मुस्कुराते देख वे भी खिसिया के भाग रही हैं, आज इनकी माँ ‘तरकारी’ बना रही है|
हर रोज हर समय विकसते हाई-वे के कई कोनों पर यहाँ रोज ’सतीत्व’ बिकता है, हर रोज यहाँ कुंती रोती है, रोज यहाँ सज सवंरकर निकलती है राधा किसी कृष्ण के लिए ,सुबह होते ही इनका कृष्ण बदल जाता है| हर सुबह इसी शहर में बनते बिगड़ते हैं रिश्ते, हर बेड़ पर किरदार बदल जाता है| ऐसे माडर्न कल्चर का गरीबी से जुझ रहे इस परिवार के जीवन पर कोई असर नहीं दिखाई देता, इनकी माँ तो बरसों से “थैली” के नशे मे रंगे कृष्ण को निभा रही है | ऐसी और ना जाने कितनी गर्वशील व्याधियों को भूल आज खुश है ये मासूम से फूल, क्योंकि आज इन की माँ ‘तरकारी’ बना रही है|

रोज की तरह हर सुबह की किरणे एक नयी आशा इन भूखे नंगे लोगों के लिए लाती है| क्या फर्क पड़ता है अगर गरीबी का अर्थ अब सिर्फ लाचार,बेबश गरीबों की तस्वीरों में नजर आता है|
हर वख्त मैं यही सोचता रहता हूं कि क्या यही आजादी और विकास का अर्थ है? कया यही ग्लोबलाइजेशन है? कया इसीलिए तडपी थी भगत सिंह की लाश? क्या इसीलिए गाँधी ने अपनी जान गवाई थी?
अब मुझसे लिखा नहीं जाता क्योंकि जितना मैं इन सवालों को रोशनी देने की कोशिश करता हूं उतना ही मेरा खून गर्म होता जा रहा है| कागज भी अब फटने लगा है,कलम भी अब कांपने लगी है| अब भूल जाना चाहता हूं ऐसे बुरे और टी.आर.पी. लेस खयालों को। इन सबसे मुझे क्या? क्योंकि इनकी माँ आज ‘तरकारी’ बना रही है|

जाते जाते:
विकास की इन मंद मंद लहरों को गरीबों के घर को भी छू लेने दो|
चन्द अमीरों और शहरों तक अगर यह सीमित रह जायेगा,
तो वो दिन दूर नहीं जब ’विकास’ भी गर्व से 'दलाल' कहलवायेगा ||

Tuesday, December 7, 2010

बदलते दौर का अदाकार-पत्रकार...



एक पत्रकार हुं मैं, हाँ बदलते दौर का एक अदाकार हुं मैं |
जिनी पड़ती है कई जिंदगिया इसी जीवन मे, हररोज डेस्क पर मेरा किरदार बदल जाता है|
मैं हालात तो बदल शकता नहीं लिहाजा मेरी आदत बदल जाती है|
दाग नहीं छुटते मेरी पोशाको से इसी लिए औरो की पोशाके दागदार बनाता हुं मैं |
दबे कुचले किरदारों की लाशो पर अपना आशियाना सजाता हुं मैं |
हाँ बदलते दौर का पत्रकार हुं मैं..
कोई दर्दनाख किरदार गुजरता है जो आँखों के सामने से तो आँखे बंध कर जरा सा शरमाता हुं मैं |
न जाने कितनी दर्दनाख कहानिया दफ़न है सीने मे फिर भी जीवित किरदारों को भूल,भूत-प्रेत की कहानिया चलाता हुं मैं |
जिंदगी की यहाँ कोई कीमत नहीं फिर भी कीमत की आश मे न जाने कितनी जिंदगिया बिगाड़ता हुं मैं|
हाँ बदलते दौर का पत्रकार हुं मैं..
सच को झूठ झूठ को सच बनाकर अपनी रोजी रोटी चलाता हुं मैं,
न जाने कितनो की रोजी रोटी छीन बॉस के सामने कमीनो सा मुस्कुराता हुं मैं|
शकल पर लगवा के " Story Approve" का ठप्पा एक सच्ची राह पर चल रहे को भटकाता हुं मैं |
हर रोज वतन, वेतन और सियासत से जूझता हुआ अपने फुल से कोमल परिजनों की जिंदगिया झुलसाता हुं मैं|
T.R.P. की टक-टक मे प्रेमिका की धक् धक् भूल जाता हुं मैं ,
बच्चो के खिलौनों को भूल " Edit suit " मे एनिमेसन बनाता हुं मैं|
हर पल लौट जाऊंगा अपनी जिन्दगी मे यही सोच मीठे सपनो की दुनिया मे सो-खो जाता हुं मैं ,
शायद वहीँ मिले मेरे सपनो का जहाँ वहीँ फुर्सद के पल बिता पाता हुं मैं|
हाँ बदलते दौर का पत्रकार हुं मैं ...