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Saturday, June 26, 2010

!.....ओनर किलिंग कल आज और कल.....!



ओनर किलिंग-ओनर किलिंग आज कल मीडिया और सामान्य लोगो के बीच ये एक बहोत ही चर्चास्पद विषय बन गया है|कई लोगो को तो ये शब्द पता ही नहीं था की इसका मतलब क्या होता है?शुक्र है हमारी मीडिया ने सब को समझा दिया|
कोई भी घटना आज कल जो हत्या से जुडी हो उसको सब से पहले ओनर किलिंग से ही जोड़ा जाता है(भले चाहे वो हो न हो,आखिरकार टी.आर.पी का जो सवाल है फ़िल-हाल ओनर किलिंग या उससे जुडे मुद्दे सब से ज्यादा टी.आर.पी दिला रहे है। और ऐसे कई सारे मुद्दे है जो सिर्फ टी.आर.पी के लिए मीडिया मैं चलाये जा रहे है मैं यहाँ उन सब की बात कर के आप का टाइम नहीं बिगड़ना चाहता, सब को पता है। और मैं ये बात भी साफ़ कर देना चाहता हूँ की मैं कोई ओनर किलिंग के समर्थन मे नहीं हूँ। “जिंदगी हमेशा मौत से बड़ी होती है”।)

बात ओनर किलिंग की हो रही है तो मैं भी क्यूँ न ज्ञान दे ही दूँ। ( भले मुझे कुछ पता हो न हो, आखिर कार ब्लॉग की टी.आर.पी का जो सवाल है।)

ये ओनर किलिंग का भूत आया कहाँ से? अगर आप एक नजर अपने समाज की रचना पर और उसके इतहास पर डाले तो ये कही न कही हमारे पुरुष प्रधान समाज की ही देन है या रही होगी। जिस देश मे स्त्री और पुरुष के बीच अ-समानता की खाई ज्यादा हो,जिस समाज मे स्त्री को एक अधिकार के रूप मे माना जाता हो,जिस देश मे स्त्री को पुरष द्वारा अधिकार दिए जाते हो वहीँ ओनर किलिंग होगी या वहीं ओनर किलिंग के किस्से ज्यादा मिलेंगे।( रही भारत की बात तो भारत मे स्त्री भगवान के स्वरूप मे पूजी जाती है,और वोही स्त्री को दहेज़ के नाम पर जलाई भी जाती है,ओनर किलिंग के नाम पर उसी-के जन्मदाता ओ द्वारा मारा भी जाता है| मुझे ये समझ मे नहीं आता की जिस कलाई पर बहन ने प्यार से राखी बाँधी हो उसी कलाई से उसका कतल कैसे हो शकता है? जिस पिता को नौकरी से या अपने काम-काज से थक हार कर घर पर आते ही प्यार से पानी पिलाया हो उसी हाथ से उनको मारने की हिम्मत कहाँ से आती है?घर के ही लोगो की लाश पर गर्वे से केमरे पर बाईट देने की ताकत कौन देता है।)
अगर आप मानते हो की ये ओनर किलिंग सिर्फ भारत मैं ही है तो आप खुद एक भ्रम मे है। ये ओनर किलिंग अपने पडोसी देश पाकिस्तान मे भी हो रही है।( जो की वहां की मीडिया उनके समर्थन मे है,इस लिए ऐसे किस्से लोगो के ध्यान पर बहोत कम आते है या आने दिए जाते है |) इस के अलावा तुर्की,जोर्डन,लेटिनअमेरिका,कुवैत,बंगलादेश और कई सारे देशो मे ओनर किलिंग हो रही है।

पाकिस्तान मे तो सिर्फ चार वर्षो मैं ४,०००० से भी ज्यादा महिलाओ की हत्या सिर्फ ओनरकिलिंग के नाम पर हुई है। दिन बा दिन ये घटना ये वहां बढती ही जा रही है।ऐसा नहीं है की वहां इसके खिलाफ आवज नही उठती, आवाज तो उठती है,लेकिन उसे एक या दुसरे तरीके से दबा दी जाती है या तो फिर ऐसी घटना ओ को बाहर नहीं आने दिया जाता। अब तो हाल ये है की आधुनिक कहे जाने वाले अमेरिका केनेडा फ़्रांस जर्मनी यू.के. मे भी ओनर किलिंग के किस्से हो रहे है। ( हम हर चीज मैं अमरीका जैसा बनने की कोशिश करते है लेकिन इस घटना क्रम मे शायद अमेरिका और दुसरे देश हमारी कॉपी कर रहे है।)
ऐसा नहीं है की इस से पहले भारत मे या और देशो मे ओनर किलिंग नहीं होती थी|
एक नजर पहले के ज़माने पर डाले तो जब लडकियां पैदा होती थी तो उन्हें दूध मे डुबो कर मार दिया जाता था।( ये कौन सी किलिंग थी),औरतो को दहेज़ के नाम पर,दूसरी जाती मे विवाहों के नाम पर पहले भी मारा जाता था, ना जाने कितनी खाप पंचायतो ने और फ़त्वो ने इज्जत के नाम पर हत्याये करवाई है ( ये भी मेरी नजर से ओनर किलिंग ही है।)
फर्क सिर्फ इतना है पहले ऐसी घटनाओ को दबा दिया जाता था या दब जाती थी, आज दबाने से भी नहीं दब रही है।

ओनर किलिंग की बदी आज-कल से नहीं सदियों से चली आ रही है फर्क सिर्फ इतना है समय समय पर इस घटना ने अलग नाम का चोला पहना है| अंध पुरषोत्तम प्रधान समाज मे कोई शख्त कानुनों से ये बदी दूर नहीं हो जायेगी इस के लिए हमें सब से पहले हमारे इस अंधे समाज के माइंड सेट को बदलना होगा। इस जूठे इज्जत के भ्रम को तोडना होगा। महिलाओ को सम्मान से जीने देना होगा। इस को दूर करने के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़नी होगी, जन जागृति लानी होगी,तभी ये पेट्रोल और गेस की कीमतों की तरह बढ़ता काले-नाग की तरफ फन फैलता ओनर किलिंग का भूत थमेगा।न की जल्दी जल्दी पी.टु.सी देने से या हाफ्ते-हाफ्ते बोलने से।

चलिए बहोत लिख लिया कोई ओनर किलिंग का किस्सा ढूँढना है या बनाना है चैनल की टी.आर.पी. जो बढानी है।

Saturday, June 12, 2010

याद रखना मैं एक पत्रकार हूँ.....!



याद रखना मैं एक पत्रकार हूँ.....!

जब से मैं इस क्षेत्र मैं आया हूँ तब से कहीं न कही ये किसी न किसी रूप मे ये शब्द मुझे सुनाई दे ही जाता है..! कभी इस मे अभिमान छिपा हुआ होता है,तो कभी इस मे गर्व छिपा होता है तो कभी कभार केमरे के पीछे की लाचारी भी इसी शब्द के रूप मै पिस टु केमेरा दे जाती है...!...

लेकिन पिछले कुछ दिनों से यही प्रश्न मैं बार बार सोचता रहा की आखिर पत्रकार यानि क्या..?! ( जब की मैं खुद एक पत्रकार बनने की कोशिश कर रहा हूँ।)इस सन्दर्भ मे मैं आप को एक घट्ना बताना चाहुंगा।

कुछ दिन पहले मेरे एक पत्रकार मित्र को घर लेना था। बहोत खुश था वो क्युंकी उसके जीवन का एक बहोत बड़ा सपना सच होने जा रहा था।उसने अपने कुछ दिनों की बचत और कुछ माँ बाप की बचत से घर लेनी की सोची थी। लेकिन वो इतनी नहीं थी की उस से वो घर खरीद ले।लिहाजा उस ने बैंक लोंन ले कर घर लेने की ठानी। हम साथ साथ बैंक गए,बेंक वाले ने जैसे मेहमान की तरह खातिर दारीकी, सब बात ख़तम होने पर जब जॉब का आप्शन आया तो उसे देखते ही हमे लोन देने के लिये उत्सुक उस शक्स के आँखों की भोंवे तन गई। कुछ हक-पकाया और बोला थोड़ी देर आप बैठो मैं अभी आया। कुछ देर इंतजार करने के बाद जब वो लौटा तो उसने अपने चहरे पर एक कमिनी सी मुस्कान लाते हुए कह दिया सॉरी सर हम आप को लोंन नहीं दे शकते। हमारी बैंक का नियम है की हम पत्रकारों को लोंन नहीं देते। सुनते ही हम लोग बहोत चीखे चिलाये पर कुछ न हुआ,अंत मैं चुप चाप वहां से निकल आये ,उस के बाद हमने कई बेंको के चक्कर काटे हर जगह एक ही जवाब मिला शोरी और वो भी उसी कमीनि मुस्कान के साथ। और अब मेरे उस पत्रकार मित्र का घर लेने का सपना सपना ही रह गया है आज तक...( क्यूँ की वो इमानदारी से सिर्फ पत्रकारिता ही करता है) | शायद ऐसा और कईओ के साथ हुआ हो लेकिन मुझे पता नहि।

बड़ी बड़ी समाज सुधार की बाते करते और सरकार पलट देने का हौंसला दिखाने वाले पत्रकार की क्या यही इज्जत है? खुद सरकार कि बनाई बेंक भी उन पर विश्वास नहीं करती भैया तो औरो से क्या आशा रखें।
चाय या कोफी की प्याली के घुंट मारते हुए मित्रो के सामने गर्व से बोलते मैंने कई लोगो को सुना है की मैं पत्रकार हूँ बड़े बड़े लोग मेरे एक फ़ोन से कांप उठते है। क्या यही पत्रकार की इज्जत है?( ये तो उसका ही मन जानता होगा की एडिटर का फ़ोन आते ही कौन कांप उठता है.. उसकी क्या हैसियत है ये तो न्यूज़ रूम या न्यूज़ डेस्क पे जाने से ही पता चलती है) मुझे यही नहीं समझ आता की किस भ्रम मैं है ये पत्रकार। कही भी ट्राफिक पुलिस ने पकड लिया तो प्रेस का कार्ड दिखा के धमकी देते मैंने कई पत्रकारो को देखा है,और यह कह्ते भी सुना है की तुम्हारे खिलाफ लिखना होगा,( जैसे सारे न्युज चेनल की स्टोरी या न्युज पेपर की स्टोरी वो ही तय करता है।) फिर उन्ही लोगो को इमानदारी के कई सारे लेक्चर देते भी मैने सुना है। कया ऐसा दो मुहा है पत्रकार? आज पत्रकार की क्या हैसियत रह गई है.?? पत्रकार शब्द के माइने क्या है?
मैं नहीं जानता लेकिन कुछ दिनों पहले मैं एक गाँव गया था, वहां एक बूढ़े आदमीं ने पुछ लिया बेटा क्या करते हो ? अपन ने शान से कह दिया (मेरे जैसे शायद सब न कहते हो) पत्रकार हूँ! जरा भी देरी किये बिना उन्हों ने झटसे कह दिया..क्या और कोई काम नहीं मिला था.! ( ये है एक बुजुर्ग की दर्ष्टी से पत्रकार।)

मेरे दोस्त के भाई का फ़ोन आया की “जर्नालिसम” करना चाह्ता हूँ। मैंने उस से पुछा “जर्नालिसम” ही क्यूँ?(पत्रकारीता के गुणधर्म के मुताबिक।) उस ने बड़े ठन्डे कलेजे से कहा की वैसे तो एक्टर बनना चाहता था लेकिन चांस नहीं दीखता तो “जर्नालिसम” ही कर लुं। पत्रकारों के आज कल बहोत ठाठ है..!(वो शायद पत्रकारीता को ग्लेमर के नजरिये से देख रहा था। ये है जर्नालिसम मैं आने वाली पीढ़ी की नजर से एक पत्रकार.!)
( ये लोग ऐशा सोचे उसमें कोई गलत नहीं है क्यूंकि मैंने खुद कई जाने-माने पत्रकारों को गिफ्ट-वाउचर के लिए झगड़ते और कई सरकारी और गैर सरकारी लोगो की बदलियों के लिए मंत्रियो से सिफारिश करते देखा है,फिर वो इज्जत कहा से पाएंगे?)

आज कल नौकरी तन्खवाह छ्ट्नी,लोबिंग और ना जाने किन किन बलाओ से जुझते है पत्रकार,लेकिन बहार दिखावा तो ऐसे करते है जैसे सब कुछ है पत्रकार...! पत्रकार की इज्जत भी दिन बा दिन घटती हि जा रहि है,उन्हे ऐसे ऐसे शब्दो से नवाजा जाता है कि उसे मै यहां नही लिख सकता।( कई सारी बिप बजानी होगी जो यहां नही बजेगी।) इसके लिये जिमेदार कौन है ये भी मै नही जनता।
वैसे तो बहोत कुछ लिखना था लेकिन क्या करूँ मैं भी एक पत्रकार बन रहा हूँ ! पढ़ कर आप क्या सोचते हो पत्रकारों के बारे मैं जरूर लिखना वर्ना याद रखना मैं भी एक पत्रकार हूँ.....!

Thursday, May 27, 2010

लव-इन या लिव-इन..!!



लव-इन या लिव-इन का मुद्दा यूँ तो अब बहुत पुराना सा लगता है। जब से भारत मे लिव-इन रिलेसन सिप को मान्यता मिल गई है, तब से इस विषय मे लगातार चर्चा हो रही है।तरह तरह के मतभेद ,चर्चा,निर्णय सामने आ रहे है।लेकिन हाल ही मे इस मुद्दे के सुसंगत एक घटना मेरी जिन्दगी मे घटी । जिसने मुझे झगझोड कर रख दिया,या युं कहे की ये लिखने पर मजबूर कर दिया।

मैं पहले वो घटना बताना चाहता हूँ| फिर आप लोग बताईयेगा की क्या सही क्या गलत।मै फैसला आप पर छोडता हुं।

मेरे साथ एक खूबशूरत लड़का राहुल (नाम बदल दिया है) और उस से भी खुबसूरत लड़की नेहा (नाम बदल दिया है) पढ़ते थे । दोनों को मैं लगभग ७ से भी अधिक सालो से जानता था। उन को जब भी मिलता दिल खुश हो जाता ।उन दोनों को देख मैं हमेशा भगवान से प्राथना करता रहता की “हे भगवान इन दोनों की जोड़ी सलामत रखना,और ये हमेशा ऐसे ही हस्ते मुस्कराते रहे”। पढते- पढ़ते कोलेज काल समाप्त हो गया और ये दोनों आगे पढने के लिये पुणे ( स्थल बदल दिया है)चले गए।कई दिनों तक राहुल के फ़ोन आते रहे उन दोनों से लगातार बाते होती रही, दोनों साथ रहकर बहोत खुश थे। पढ़ते थे और साथ में जॉब भी करते थे । लेकिन फिर जैसे फिल्मो मैं कहानी मोड़ लेती है वैसे ही इन के जीवन मैं कुछ साल पहले कहानी ने करवट ली। दोनों ने अपने अपने घर मे शादी करने की बात कही ( दोनों एक दुसरे को अच्छी तरह जान चुके थे और एक दुसरे पर पूरा भरोशा भी था।दोनों बहोत अच्छे दोस्त भी थे,और इससे ज्यादा क्या चाहिये शादी के लिये? मुझे तो यहि मापद्डं लगता है।)

जैसे फिल्मो मैं होता है वैसे ही इन दोनों के माँ बाप ने भी रिश्तो से इन्कार कर दिया। क्यूँकी नेहा के परिवारवाले एक बहोत बड़े उद्योग घराने से थे और एक ऊँची जाती के भी थे। राहूल के घरवाले भी अच्छा खासा रसूख रखते थे पर वो एक निचली जाती के थे लिहाजा राहुल और नेहा के लगातार एक वर्षो के प्रयास के बाद भी उन दोनों की शादी की बात न बन सकी।फिर उन्हों ने भी प्रय्तन करना ही छोड़ दिया और पुणे मे साथ-साथ रहने लगे। पढाई खतम की फिर वहीँ नौकरी भी करने लगे। आज के समय मे कहे तो वो लोग “लिव-इन” मैं रह रहे थे । एक दुसरे की जरुरतो का पूरा ख्याल रखते एक दुसरे की हर चाहत पूरी करते। उन दोनों के बीच जिस तरह का रहन सहन था उस से लगता था की इतना प्यार तो कोई शादीशुदा जोडे के बीच भी नहीं होगा जितना प्यार इन दोनों के बीच था। वो एक प्यार भरे ’कपल’ की तरह जी रहे थे । मुझ से उन लोगो की बात होती रही इस से मुझ पता चलता रहा की वो लोग बहोत खुश थे।पर जैसे जैसे समय बीतता गया वैसे नेहा के घरवालो का शादी करने का दबाव बढ़ता गया। नेहा के घर वालो को राहुल के साथ रहने की भी खबर लग चुकी थी इस वजह से वो और भी दबाव बना रहे थे।
एक दिन अचानक नेहा का फ़ोन आया की उसकी शादी तय हो गयी है, और मुझे जाना है उसकी शादी मे। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मैंने उसे बधाईया दी,मेरी बधाइया ख़तम होते ही वो जोर जोर से रो पड़ी और बताया की उसकी शादी राहूल से नहीं किसी और से हो रही है जिसे वो जानती भी नहीं और आज तक मिली भी नहीं। मैंने उस से शादी के लिए हाँ क्यूँ कहा ऐसा प्रश्न किया तो उसने बताया की उसकी माँ ने आत्महत्या करने का प्रयास किया था और नेहा को कहा की अगर वो उनके बताये लड़के से शादी नहीं करती तो वो और नेहा के पिता दोनों खुद्कुसी कर लेंगे। लिहाजा नेहा को शादी के लिए मजबूरन हाँ कहना पड़ा । फिर मैंने राहूल को फ़ोन लगया उस से बात हुई वो बिचारा भी बहोत रोया उसने कहा की ना चाहते हुए भी हमने ये फैसला लिया है। क्या करे समाज के नीति नियम और माँ बाप के आगे हम दोनों मजबूर है। कुछ दिनों मैं नेहा की शादी हो गई और उसके कुछ दिनों बाद राहूल ने भी शादी कर ली।बाद मैं राहूल ने बताया की उसे खुद नेहा ने ही ऐसा करने को कहा था। पर जो रिश्ता जबर-जस्ती जोडा गया हो, जिस रिश्ते की बुनियाद ही धमकी और डर पर रखी गई हो वो कहा ज्यादा दिन तक चल पाती?

नेहा और राहूल की शादीशुदा जिन्दगी मे भी लडाई झगडो की शुरुआत हो गई ।राहूल अपनी पत्नी मे हमेशा नेहा को ढुढंता रहा और नेहा अपने पति मे राहूल को। दिन-ब-दिन परिस्थितियां और भी बिगडने लगी मैंने नेहा और राहूल को समझाने कि बहोत कोशिश की पर कुछ सुधार नहीं आया।फिर कुछ दिनो तक मेरा उन से संपर्क नही रहा। एक दिन अचानक ही मुझे पता चला की राहूल ने जहर खा कर और नेहा ने पंखे से लटककर अपनी जान दे दी| खबर सुनते हि मै सन्न हो गया,हाथ पांव मे मानो खुन जम सा गया, आंखो के सामने दोनो के वोही मुसकुराते चहरे घुमने लगे। मैं दोनो के साथ बिताये लम्हो को याद कर खुब रोया। कुछ दिनो बाद उन दोनों के माँ बाप से भी मिला। मैं उनसे कुछ कह तो नहीं पाया किन्तु अंदर से एक आह उठी की “हो गई न शान्ति। तुम क्या आत्महत्या करते थे कर दी ना अपने लड्को कि हत्या। अब क्यूँ रो रहे हो तब मान गए होते तो ये दिन न देखना पड्ता। अरे आपको मंजुर नहीं था तो रहने देते उनको उनकी लिव-इन की दुनिया मे कम से कम हसी खुशी जिन्दा तो रहते। क्या जरुरत थी दोनों को मजबूर करने की। मार डाला ना।“

अब आप ही बताईये कि “लव-इन” या “लिव-इन”

Thursday, May 13, 2010

प्रेम यानी ....प्रेम....!!!!!



प्रेम यानी एक अन्जानी सी दुनिया मै एक प्यारे से साथी का साथ।
प्रेम यानी आंखो से बहते हुए आंसुओ को मुस्कान का रस्ता दिखाते हाथ।
प्रेम यानी भीड मे भी होता अकेले पन का एहसास।
प्रेम यानी मोत को भी मधुबन मे बदल देता अंदाज।
प्रेम यानी सारी दुनिया को बागी बनाने का जोश पालता एक मीठा सा आगास।
प्रेम यानी किसी के कंधो पर सर रखकर रोने का ईक अनोखा अंदाज।
प्रेम यानी किसी की गोद मे सोते हि दुनिया के सारे गम भुलाने-भुलने का एहसास।
प्रेम यानी जलते अंगारो पर बर्फ़ की तरह चलने की अभिलाषा।
प्रेम यानी बंजारो कि तरह गलियो-गलियो मे घुमते रहेने कि ईच्छा।
प्रेम यानी सब कुछ जानते हुए भी बार बार एक हि बात और एक ही आवाज सुनने कि महेच्छा।
प्रेम यानी घंटो तक एक ही नजर को देखते-ढुंढ्ते रहेने कि अभिलाषा।
प्रेम यानी किसी के दुर जाते ही दिल की धडकन रुकने का एहसास।
प्रेम यानी किसी को गले लगाने की दिल मे उठती एक अनोखी आवाज।
प्रेम यानी किसी के जाते ही मर जाने की चाहत।
प्रेम यानी अपनी हर पंसद और ना पसंद को कुर्बान कर के उसकी पसंद को अपना ना।
प्रेम यानी हर पांच मिनीट पर आते वो “कहां हो” वाले प्यारे से मेसेज।
प्रेम यानी घंटो तक बाते करना और कहना आज ठीक से बात नही हो पाई।
प्रेम यानी कुछ खट्टे मिठे झगडे,थोडा रुठ्ना मनाना और फिर गले लग जाना।
प्रेम यानी किसी की टिफीन से खाना खाने का बहाना करना,और खाते वक्त सिर्फ उसे ही निहारना।

प्रेम यानी ....प्रेम....!!!!!

प्रेम ये क्युं होता है प्रेम...?????

"दीलीपसिंह"

Saturday, May 8, 2010

मां ...शब्द ही काफी है...!



माँ....

ये शब्द शायद सब ने सुना,जाना माना और पहचाना है। दुनिया मैं आज के समय मैं माँ और बच्चे का ही एक रिश्ता है जो शायद कोई स्वार्थ के बिना निभाया जा रहा है।किन्तु कुछ जगह और संजोगो मे ये रिश्ता कलंकित भी हुआ है।शास्त्रों मे भी माँ को भगवान से बड़ा दर्जा दिया गया है।और माँ के बारे मैं भी बहोत कुछ लिखा भी गया है।और बहोत कुछ पढ़ा भी गया,बहोत कुछ सुना भी गया है। मैं यहाँ उन सब की बात नहीं करने वाला।मैं यहाँ बात करूँगा मैंने क्या अनुभव किया है इस रिश्ते से,मैंने काया पाया है और क्या खोया है इस रिश्ते से,

एक छोटा शा बच्चा जो इस दुनिया मैं कदम रखता है,हाथ खोले हुए और बाहें फैलये हुए जिसके पास कुछ नहीं होता,लेकिन इस धरती पर पहला कदम रखते ही वो सब से पहले जो चीज पाता है वो माँ का आँचल है। माँ नहीं होती तो दुनिया कया है शायद उसे या मुज़ जैसे को कभी नहीं पता चलता। इस दुनिया मैं कदम रखते ही मैंने सब से पहले जिस का साथ पाया वो मेरी माँ का था। लोग आज कल जहाँ एक ग्लास पानी पिलाने के पीछे भी आपना स्वार्थ देखते है,वहां मां ने अपने रक्त और प्यार से मुजे पाला पोशा है और वो भी बिना किसी चाहत के बिना किसी स्वार्थ के। शायद यही वजह थी की भगवान भी हमेशा माँ का आँचल पाने के लिए तरसते रहे। आज कल जहां लोगो को सामान्य सी गंध आते ही उलटी होने लगती है, वहीं नाक मे से बहते प्रवाही को और बहोत सी गंदकीओ को जो हर बच्चे मे शामिल थी उसे बिना मुह बिचकाए दूर करती और दूर कर रही है वो मां है। और बच्चा जैसे जैसे बड़ा होता है वैसे वैसे उस मे भी कई सारी सामाजिक बदिया आती है उसे भी जो दूर करने का जो प्रयास कर रही है वो मां है,वो भी बिना कुछ मांगे बिना मुह बिचकाए.!(आज तो अगर किसी ने सामान्य सा रास्ता आप को दिखा दिया हो तो भी उसके पीछे उसका स्वार्थ छिपा रहता है,की कल मैं रास्ता भूल जाऊंगा तो मुजे कोई रास्ता दिखायेगा।)

चलिए मेरी बात करु तो जब से मै जन्मा तब से लेकर आज तक मुजे हर कदम पर जो रास्ता दिखा रही है वो मेरी माँ है। मुझे जब मेरे घरवाले आगे न पढ़ कर कोई बिजनस करने की बात कह रहे तब सारे घर से लड़ झगड के मेरे साथ अकेले जो खडी रही वो मेरी माँ थी।जब मेरे फैसले सारे घरवालो को गलत लगते थे तब सिर्फ एक ही व्यक्ति को मेरे फैसले सही लगते थे वो मेरी माँ है। जब भी मैं एक कोने मैं जा-जा कर अकेला रोया दुखी हुआ तब सिर्फ एक ही व्यक्ति को पता चला वो मेरी माँ है। जब भी मैं किसी निर्णय मे हारा और नाकामयाब हुआ खुद पर से यकीन हट गया तभी भी एक ही व्यक्ति मेरे साथ खडा दिखाइए दिया वो मेरी माँ है। जिन्दगी के एक मोड़ पर जब मैं मरने की कगार पे था तब भी मुजे जीने की ईक नई राह दिखाई वो मेरी माँ है। आज भी जब भी मै दुखी होता हुं या अकेला पन महसूस करता हुं तब दूर बैठकर भी एक ही व्यक्ति को पता लग जाता है वो मेरी माँ है। मेरे अकेले पन का न जाने उसे कहाँ से पता चल जाता है और उसी वक्त उसका फ़ोन आ जाता..शायद इसलिए वो मेरी माँ है। दुनिया या इस दुनिया के लोग जब भी मुझे ठुकराते है या यु कहे के जब भी धिकारते या नकारते है तब उसके सही मायने बता कर, अपनी ममता का आँचल फैला कर, मेरे सारे गमो को अपना कर अपनी बाहों मैं सुलाया है वो मेरी माँ है। जिन्दगी के हर सही गलत फैसलो मैं जो मेरे साथ है वो मेरी माँ ही है।

मेरा सवाल उन सभी नौ-जवानो से है जो आधुनिकता की अंधी दौड़ मैं है,और अपने आप को आधुनिक कहलाने के चक्कर मै जिसने इस दुनिया मै आने का रास्ता दिखाया है उस माँ को ही वृधाश्रम का रास्ता दिखा रहे है.?क्या उस मां ने आप को इसी दिन के लिये पाल पोस कर बडा किया था.? उन सब से मैं पूछना कहता हूँ की आप की हिम्मत कैसे चलती है मां जैसी ममता की मुर्ति से दूर व्यव्हार करने की.? माँ जैसे भी है वैसी, उसने अपने रक्त से आपको सींचा तो है न.? आप के पैदा होते ही अगर वो आप को रस्ते पर रखाई होती तो..?? या आपके बड़े होते ही वो आपको पढाने लिखाने का खर्च मांगती तो.(भैया इस जनम मैं तो क्या अगर अगला कोई और जनम है भी तो आप अपनी माँ का क़र्ज़ नहीं चूका पाओगे.)आज नाम कमाने कि कोशिश मे हर कोइ लगा हुआ है । एक छोटा भी काम अगर कोई करता है तो उस्के पीछे उस्को कितना नाम या प्रसिध्धि मिलेगी यहि सोचता है,लेकिन मां ही एक ऐसी व्यक्ति है जो बच्चे को जन्म भी देती है लालन पालन भी करती है लेकिन नाम पिता का देती है,ऐसा बलिदान और कोई देता है क्या ? या युन कहे की दे शकता है क्या?

मेरी उन सभी नौजवानों से प्रार्थना है की मधर्स डे जैसा कोई दिन नहीं होता की उसी दिन आप अपनी माँ से प्यार का इजहार करो।भैया मधर्स डे तो हर दिन हर पल होता है।मां ने आप के और अपने परिवार के लिए जो किया है,या कर रहि है उसकी कीमत जानो और उसका मान सामान करो यही उसके लिए बहोत है। कोई कार्ड दे कर या कोई अच्छी सी गिफ्ट दे कर माँ से प्यार जताया नहीं जाता.। माँ को ये सब चाहिये भी नही, उसे चाहिये तो सिर्फ आप का प्यार और आप की खुशी । मेरी मेरे दोस्तों से गुजारिश है की माँ को सच्चे दिल से प्यार करो फिर देखो दुनिया की कोई ताकत तुम्हे हिला और हरा नहीं सकती.।

LOVE U MOM……!

Friday, April 16, 2010

मारे शु.??? (मुझे क्या.??)


मारे शु.??? (मुझे क्या.??)

ये शब्द से मेरे गुजराती मित्र शायद सब से ज्यादा परिचित होंगे।लेकिन जो नहीं जानते उन्हें थोडा समझाता हुं।
मारे शु.?का हिंदी मैं अर्थ होता है मुजे क्या.?
ये शब्द गुजरात में बहोत ही ज्यादा प्रचलित है और जगह भी प्रचलित होगा लेकिन मुझे पता नही।कभी लोग अपनी जवाबदारियो से बचने के लिए तो कभी आपना फायदा निहारने क लिए ये शब्द का इस्तेमाल करते है..लेकिन जब भी मैं ये शब्द सुनता हूँ तो मुजे बहुत अखरता है।

रास्ते मैं किसी का “एक्सिडेन्ट” हो गया है,वो बिचारा दर्द से कहराह रहा है,फ़िर भी घंटो तक अपने सेलफोन पर बतियाने वाले लोग एक सामान्य सा फ़ोन १०८ को नहीं कर शकते.? मारे शु.?? भले वो आदमी मर जाता है.?? उसके परिवार मैं भले ही एक वो ही कमाने वाला है.? मारे शु?अरे भाई कभी इस मारे शु से आगे भी सोच कर देखिये.?जवाब मिलता है.केम मारे शु? शु काम मारे फोन करवो जोइए।(क्यूँ मुजे फ़ोन करना चाहिए) खाली-पिली पुलिस के लफड़े मैं कौन गिरे भाई.?? मेरा उन सभी से सवाल है अगर उस अनजान व्यक्ति की जगर अगर आप का कोई परीजन होता तो क्या आप यही कहते.?उस वक्त तो आप समाज और देश दुनिया को बोलते हो कैसे मतलबी लोग है? पर वो ही चीज जब दुसरो के साथ होती है तो “मारे शु” हो जाती है.?

बात आज कल के सब से हॉट- टोपिक पोलिटीक्स यानि की राजनीती की।सब कहते है की भाई नेता गंदे है।पोलिटिक्स गुंडों का काम है।बस बोलना है लेकिन जब वोट की बात आती है तो फिर वो ही मारे शु.?? गर्मी बहोत है वोट डालने कौन जाये ? सब लोग गुंडे है। इन्हे वोट कौन दे.? अरे कभी खुद भी इस मैदान मैं उतर कर देखो। अगर आप के घर मैं कचरा पड़ा हुआ है और आप की कामवाली बाई नहीं आती है तो आप को ही कचरा साफ करना होगा वर्ना आप का ही घर आप को बदबू देगा.उस वख्त आप नहीं कह सकेंगे मारेशु.?उसी तरह कभी इस देश को भी अपना घर मान के देखिये। भैया कोई भी चीज हो पहले अपने फर्ज से अदा रहिये फिर अपने हक़ के बारे मैं बात करिए.! अपने आप को बदलने की शुरुआत करिए।देश और दुनिया बाद मैं बदल लेना।शुरुआत तो करिए।

और कई बाते है जैसे की कई दिनों से घर मे पानी नहीं आ रहा है। नेता से लेकर सामान्य कार्यकर तक सब को गरिया देंगे लेकिन उनके खिलाफ फ़रियाद कोई नहीं लिखवाएगा।मैं ही क्यूँ जायुं,सब के घरो मे तो पानी नहीं आता।अरे भाई दुसरो का ख्याल मत करो सिर्फ अपने घर का ख्याल करो और एक बार लीगल कम्प्लेन कर के तो देखो।देश मैं से भ्रष्टाचार कम नहीं हो रहा,लोगो के सामने तरह तरह की दलीले और भासण बाजी हो जाएगी।लेकिन जब खुद का काम कही रुकता है तो भैया जो पैसे चाहिये वो लेलो मेरा काम जल्दी से खतम कर दो। मुजे दुसरो से मतलब नहीं है।भैया मतलब नहीं क्यूँ है?आप के जैसा ही हर कोई सोचता है,और भ्रष्टाचार का राक्षस दिन-ब-दिन बढ़ता है।इस से मुझे क्या.?(मारे शु.?) किसी के झग्डे मे गवाही देने को कहो तो फिर वही मारे शु.?? भले ही उस ने सब कुछ देखा और सुना है.? लेकिन जब उन्के साथ ऐसा होता है तो उनहि का नजरीया और शब्द दोनो बदल जाते है। किसी से दो शब्द प्रेम के कहने से उसका भला हो जाता है फ़िर भी उसके लिये कहेंगे नहीं।मुजे उससे क्या.?? मुजे क्या फायदा मिलेगा.?? अरे भैया कभी बिना फायदा का भी काम कर के देखो.??

बात मेरे कुछ मीडिया वाले दोस्तों की।हर कोई एक दुसरे के चैनल के कंटेंट को बुरा बता कर अपने आप को अलायदा कहते है।लेकिन बात तो वो दुसरो की तरह ही करते है।हाल ही मैं सानिया और आई.पी.एल. पर सारी मीडिया कूद पड़ी थी। लकिन हर चैनल वाले अपने डीसकशन मैं यही चलाते थे की भैया सानिया और आई.पी.एल को इनता महत्त्व देना चाहिये की नहीं?पर भाईसाह्ब आप उन्ही पे चर्चा कर के एक घंटे का प्रोग्राम बना के साबित क्या करना चाहते है?पहले आप का चैनल खुद तो देखिये।सुबह से लेकर शाम तक आप ने भी सानिया को ही चलाया है क्यूँ.?? टी.आर.पी. का जो सवाल है?
आप सब से मैं गुजारिश करता हूँ की आप खुद ये बंध कर के तो देखिये..! हर बार दुसरो को जिमेवार बना के आप क्यूँ आपनी जिमेदारियो से बचना चाहते है? कभी कोई काम बिना फायदे के भी तो कर के देखिये।बड़ा शकून मिले गा.!!

एक मशहूर शायर ने कहा है..वो ही मैं भी दोहरहा रहा हूँ..

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही,मेरा मकसद है की ये सूरत बदलनी चाहिए,घनघोर अंधेरों ने घेरा,हर एक तन हर एक मन,ये अँधेरा चीर एक शमां तो जलनी चाहिए,

ये बात सब पर लागु नहीं होती ये बाबा दिलीपानंद के अंगत विचार है।आप को इस से असहमत होने का पूरा हक़ है।अगर नहीं भी है,तो मारे शु.???

कर के देखो.??

Tuesday, April 13, 2010

क्षमा याचना..!!


कुछ निजी कारणों से नइ पोस्ट नहीं लिख पा रहा लिहाजा दोस्तों कुछ समय के लिए अपने इस ना चीज दोस्त को क्षमा करे.!जल्द ही एक नए विषय पर और एक नयी बात लेकर आप के सामने उपस्थित होऊंगा |