मुख्य आलेख..!:


Tuesday, August 24, 2010

|| चोला टी.आर.पी. का ||



सुबह के लगभग ७ बज रहे थे हम लोग गुजरात और मध्यप्रदेश के बोर्डर रतनमहल जाने के लिए निकल चुके थे| वैसे सुबह-सुबह कई सारे मेसेज आते है लेकिन एक मेसेज जो गुजरात के ही एक छोटे से प्रान्त उंझा से आया था उस ने मेरा ध्यान खीचा|

मैंने मेसेज पढ़ा और तुरंत ही मेसेज करने वाले मेरे मित्र को फ़ोन लगाया। सामने के छोर से वो लगातार बोले ही जा रहा था उस की बात जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी वैसे-वैसे मेरे रोंगटे खड़े होते जा रहे थे | फोन करने वाला मेरा मित्र बता रहा था की कैसे दो पत्रकारमित्रो ने एक एक्सक्लुसिव घटना के लिए एक कहानी रची थी जिस मे उन्हों ने एक निर्दोष व्यक्ति की जान ले ली।

बात कुछ यों है की उत्तर-गुजरात के ही एक इलाके मेहसाना से कुछ किलोमीटर दूर उंझा नामक एक शहर है जो ज्यादातर अपने “जीरा” निकास और विकास के लिए जाना जाता है। हाल ही मे हुये उमिया महोत्सव की वजह से भी उंझा का नाम सारे विश्व मे गूंजा था | फिलहाल एक बार फिर उसका नाम पुरे देश मे गूंजा है अच्छी वजहो से नहीं बल्की देश के चौथे स्तम्भ की गलत कारनामों की वजहों से। चलिए विषय भटकाव हो रहा है मुख्य बात पर आते है, बात उंझा की है दो पत्रकार मित्रो को उनके डेस्क से लगातार कुछ नया या एक्सक्लुसिव देने के लिए फ़ोन आ रहे थे। वो भी लगा तार दबाव से तंग थे। सो कुछ नए की तलाश मैं थे। ऐसे मैं उनको एक व्यक्ति का मदद के लिए फ़ोन आया( जो अपने परिवार के प्रोपर्टी के झगड़ो की वजह से परेशान था| उन पत्रकारों के दिमाग की काली घंटी बज उठी| जो उन्हें सही दिशा मे बजानी चाहिये थी वो गलत दिशा मे बजायी|

उन्हों ने उस व्यक्ति को इक विचार सुझाया की ऐसे कुछ नहीं हो पायेगा हम कह रहे है ऐसे करो तो तुम्हारी कुछ न्यूज़ बनेगी और तुम्हारा काम हो जायेगा | उन्हों ने उस व्यक्ति को सुझाव दिया की तुम उंझा पुलिसथाने जा कर आत्मविलोपन की धमकी दो और न माने तो खुद पर मिटी का तेल छिडक लो और माचिस लगा लेना हम लोग वहीं रहेगे तुम जैसे ही थोड़े जलोगे हम लोग आकर बचा लेंगे| वो बिचारा आफत का मारा उन की बातो मे आ गया और वैसे करने को तैयार हो गया| हाथ मे मिटी का तेल लिए पहोच गया पुलिसथाने उसने उन पत्रकारों ने जैसी स्क्रिप्ट टाइप की थी बिलकुल वैसे ही किया | उसे कहाँ पता था था आज कल के पत्रकारों के बारे मे,और आज के पत्रकारिता के बारे मे | उस ने जैसे ही मिटी का तेल अपने जिस्म पर छिड़का की हालफिलहाल मगरमच्छ की तरह मुह फाड़े खड़े पत्रकारो के केमरे रोल हो गये। उन्हों ने उस आदमी को दगा दिया उसे बचाने की बजाय सुट करने लगे थोडी देर तक वो जलता रहा जब उन दोनों ने सुट करना बन्ध नहीं किया तो अगल बगल के कुछ लोग दौड़े और उसे बचाने के प्रयास किये | उसे जबरन हॉस्पिटल पहोचाया लेकिन जबतक वो हॉस्पिटल के दरवाजे पर जा कर जीवन के लिए दस्तक देता तब तक उस के प्राणपंखेरू उड़ चुके थे| और उन पत्रकारों की स्टोरी फाइल हो चुकी थी|
ये लिखे जाने तक जिन पर उस मासूम की जान लेने का आरोप है वो “पत्रकार” फरार है। पुलिस ने उन दोनो पत्रकारो के खिलाफ़ आत्म हत्या के लिये उक्साने के आरोप लगाते हुए एफ़.आइ.आर दर्ज कर ली है। और इस घटना के प्रत्यक्षदर्शीओ ने भी अपने अपने बयान दर्ज करवा दिए है।
अब इस घटना के दस दिन बाद चर्चा हो रही है की क्या ये गलत था या वो गलत था|( शायद पहले हमारे मीडिया के बोस लोगो को ईस मे टी.आर.पी. ना दिखी हो जो अब दिख रही है।) जो भी सही गलत हो उसका फैसला तो हमारी न्यायपालिका करेगी लेकिन उस बिचारे का क्या जिस ने एक एक्सक्लूसिव मैं अपनी जान गवा दी? इसके पीछे क्या सिर्फ वो ही दो पत्रकार जिमेदार है?? या फिर टी.आर.पी. की अंधी दौड़ मैं सामिल हमारे उच्च पदस्थ सारे बॉस जवाबदार नहीं है ? हर दिन कुछ नया हर दिन कुछ तडकता भड़कता??? कहा से आयेगा हर रोज तड्कता भड्कता? ऐसे ही आयेगा ना। अगर अब भी हमारे टी.आर.पी. वान्छुक मीडिया मंधाताओं की आँख न खुली हो तो आने वाले दिनों मे ऐसे किस्से आम हो जायेंगे | उन पर भी उन्ही चैनल्स पर आधे घंटे का कोई प्रोग्राम बनेगा और बस जवाबदेही ख़तम|

“चोला टी.आर.पी. का है, हे राम, अभी सभल जा हे मेरे यार,नही तो एक दिन आयेगी सबकी बारी।”

यहाँ पर लिखी सारी बाते घटनास्थल के लोगो द्वारा बताई गयी है ये गलत भी हो सकती है लेकिन उस निर्दोष ने जान गवांइ है,ये सच मिटाने से भी नहीं मिटेगा|

Saturday, August 7, 2010

बोये पेड बबुल का 'आम' कहा से होय.??



आप कोई भी समय कोई भी चैनल लगा लीजिये कहीं न कही आप को लुट,बलात्कार, खून, चैन स्नेचिंग की घटना पे डायन की तरह से जोर जोर से चिलाते या मिमियाते न्यूज़ एंकर दिख ही जायेंगे। कोई भी अख़बार उठा लीजये आप, तो आप को फ्रंट पेज पर लूट बलात्कार से भर हुए कोलम मिल ही जायेंगे। क्या आप ने कभी इस के पीछे क्या और कौन जिमेदार है ये सोचने की कोशिश की है( मैं आधे घंटे का प्रोग्राम भरने की बात नही कर रहा। ) कुछ दिलो दिमाग से सोचने की बात कर रहा हूँ.|

एक ऐसी सोच की जिस से समाज मे और उस तकलीफ मे कुछ सुधार आ सके। आप Mtv लगा लीजये कभी न कभी आप को स्टंट मेनिया का प्रोमो या प्रोग्राम दिख ही जायेगा,जिस मैं नव युवा लड़के लकडिया आप को जान जोखिम मे डाल कर स्टंट करते दिख जायेंगे। और उन जोखिमो का प्रमोसन भी खूब प्रभावी ढंग से किया जाता है। फिर बारी आती है हमारे न्यूज़ चेनलो की हर रोज एक पैकेज बन जाता है, दिल्ही की सड़क पर छाया बाईकर्स का आतंक, फला फला जगह पर हुआ “हिट एन्ड रन केस” ( भैया मैं पूछता हूँ की एक तरफ आप स्टंट मेनिया कर के नौ जवानो को उकसा रहे हो दूसरी तरफ जब वो आप के उकसावे पर पूरी तरह तैयार हो जाते है तब आप उन्ही पर खबर बना देते हो|वाह रे हमारा मीडिया समाज)

सिगरट और तम्बाकू का आविष्कार किस ने किया ? हम ने| फिर उस पर बड़े बड़े चित्र भी हमने ही लगाये की सिगरेट पीना स्वास्थ के लिए हानी कारक है। कैंसर भी हमने पैदा किया और उससे बचने की दवा भी हमने ही बनाई है। मेरा प्रश्न सिर्फ इतना है की जिस गढ्ढे को आप ने खोदा है अगर उस मे आप गिर जाते हो तो फिर इतना शोर-शराबा क्यूँ मचाते हो ??? भाई ये तो वो बात हुई कि चोर को कहिये की चोरी कर और फिर चिलायिए चोर चोर.....!

आज कल हर जगह “सप्लिट्स-विला” और “ट्रुथ लव केस”( MTVऔर VTV के प्रोग्राम है।) की चर्चा है। दूसरी तरफ चर्चा ये भी है की आज कल भारतीय समाज में शादीया जल्दी टूट रही है। लोगो के शादिओतर संबध मे दिनों-दिन बढ़ावा हो रहा है, मैं पूछता हूँ की एक तरफ तो आप “सप्लिट्स-विला” और “ट्रुथ लव केस” मे प्यार मे गद्दारी करना सिखाते हो और जब वो ही चीज समाज पर हावी होने लगती है तब चिलाते हो। ऐसी परिसिथिति का निर्माण ही क्यूँ किया की जो समाज के लिए खतरा बन जाए। ( शायद फिर ये आधे घंटे का शो कर के प्रोग्रामिंग चेनल की टीआरपी नहीं आती ऎड नही मिल्ते। )

हम ही स्टोरी चलाते है की क्रिकेट को ज्यादा अहमियत दी जाती है भारत के अन्य खेलो को नहीं|( अरे प्राइम टाइम मे क्रिकेट पर आधा घंटा, क्रिकेटरो की लाइफ स्टाइल पर घंटो के प्रोग्राम कौन चलता है ? और किसी खले पर कोई स्पेशल प्रोग्राम नहीं बन शकता क्या...!) क्राइम पर सनसनी और न जाने क्या क्या बनाते है हम,आप और हमारे मीडिया के मित्र और फिर चिलाने वालो मे भी हम आप और वो ही है की देश मे क्राइम बढ़ रहा है। हमारे भुतपूर्व राष्ट्रपति कब से कह रहे है की “पोसिटिव पत्रकारिता” करो खेती पर कार्यक्रम बनाओ। उन्ही के शब्दों की दुहाई देते न्यूज़ चनलो से मेरा प्रश्न है की आप ने कब उनकी बात मानी और ऐसे न्यूज़ चलाये.! क्या पोसिटिव पत्रकारिता नहीं हो सकती? ( हो शक्ति है लेकिन टी.आर. पी. जो नहीं आती ऐसे प्रोग्रामस की | पिपलो मीटर जो नहीं लगे होते ऐसे क्षेत्रो मैं|)
बात यही पर आकर नहीं अटकती आज कल एक नया फेशन चला है बन बैठे विवेचको मे, कुछ भी हो कैसे भी गुनाह हो घुमा फिरा कर नौजवानों के सर मढ़ दो, किसी न्यूज़ चैनल पर जा के “बाईट” दे दो काम ख़तम। ( विवेचन का नया तरीका)

आज कल सभी पानी मथ कर दही निकाल रहे है। लेकिन लोगो को पता नहीं चलने देना चाहते की वो पानी मथ रहे है। सब को दिखा भी रहे है और दिलशा भी दे रहे है की धैर्य बनाये रखिये हम लोग दही मथ रहे है इस में से माखन निकलेगा वो आप सब को ही देंगे।

मेरा ये प्रश्न उन सभी लोगो से है की जो हमेशा ये प्रश्न उठाते रहते है की पोलिटिक्स से अच्छे लोग दूर रहते है। वोट नहीं करते बला बला बला...। मेरा प्रश्न उन सब से है की उनको वोटिंग तक खीच लाने के लिए आप ने क्या किया?????

चलिए अब भासण बाजी और लेक्चर बहोत हो गया, मैं भी कुछ नहीं कर पा रहा इन सब के लिए या मैं भी कुछ नहीं करना चाह रहा सो यहीं अपनी भड़ास निकाल दी ( या दुनिया को मैं भी ये दिखने की कोशिश कर रहा हूँ की मैं भी अब विवेचक हो गया हूँ | या मेरी भी गणना अब बौधिको मे होनी चाहिए।)

बाकि क्या है ये संसार एक मोह माया है क्या लेकर आये है और क्या लेकर जायेंगे|( न्यूज़ बुलेटिन लेकर आये थे टी.आर.पी. लेकर जायेंगे|)

Tuesday, July 27, 2010

|| चल रे मनवा रेल वे ट्रेक ||



कुछ दिनों पहले ही मैने भारत की एक अजायबी भरी सेवा से भारत की ही एक दुसरी अजायबीओं से भरी दुनिया देखी। भारतीय रेल की “राजधानी” से भारत की राजधानी की और जा रहा था। सुबह का वख्त था, ट्रेन मे और कुछ काम तो होता नहीं, लिहाजा जो मेरे जीवन मे बहोत कम होता है वो हुआ, मैं सुबह जल्दी उठा। प्रक्रुति के नजारे आँखों को खुब लुभा रहे थे। धीमे धीमे ट्रेन आगे बढ़ रही थी,वक्त गुजरता गया और रेल्वे ट्रेक की तरह पृकृति के नजारे आँखों से ओझल होने लगे थे। ट्रेन के नीले कांच के अन्दर से रेल्वे ट्रेक के किनारों की एक नई दुनिया की झांकी झांक रही थी। वो कुछ ऐसी दुनिया थी जिसे देख कर मैं हैरान हो गया।

सुबह उठते ही बाथरूम का दरवाजा खोलने की आदत शायद सबको है। लेकिन रेल्वे के किनारे बसे लोगो की दुनिया मे शायद ये नसीब नहीं है। खुला आसमान ही उनका बाथरूम है और रेलवे ट्रेक ही उनकी दिनचर्या सुरु करने का स्थान। एक दिन अगर घर मे पानी नहीं आता तो मैं व्याकुल हो जाता हूँ,लेकिन इन्हें देख कर ये प्रश्न हुआ की ये लोग पानी कहा से लाते होंगे ? सोने के लिए मुलायम गद्दे हमेशा मेरा इंतजार करते है जिनके बिना मुझे कभी नींद नहीं आती, वोही एक छोटे से मासूम को रेलवे ट्रेक के कंकडो पर सोते देख मुझे सारे सुख याद आने लगे। सोने के लिए पिन-ड्रोप सायलंस की आवश्यक्ता शायद मुझे हमेशा रहती है। लेकिन एक बुजुर्ग को रेल्वे से एक दम सटके अपनी चारपाई डाल कर एक दम शोर-शराबे के बीच आराम से सोते मैंने देखा। २० बाय २० का कमरा भी मुझे हमेशा छोटा लगता था, लेकीन १० बाय १० के कमरे मे कई लोगो को रेल्वे के किनारे आराम से रहते देखा। १० मिनिट भी चाय मिलने मे देरी हो जाय तो घर मे मैंने चिल्लाते हुए लोगो को देखा है। लेकिन रेल के इस किनारे कईओ की सुबह बिना चाय के होती मैंने देखी। अलार्म से हमेशा नींद को त्यागने वाला मै ये सोच कर दंग रह गया के रेल्वे के ईन्जन की सिटी न जाने कितनो का एलार्म है। कितनो की सुबह सिर्फ उसकी एक आवाज से होती है।
मुझे सुबह होते ही अखबार और देश की चिंता सताने लगती है लेकीन पहली बार रेलवे के किनार लोगो को सुबह उठ कर सिर्फ खाना कहाँ से आएगा ऐसी चिंता करते देखा। लोग जितना जल्दी हो उतना जल्दी इन रेलट्रेक वाले अपने घरो को छोडना चाहते थे,वंही मेट्रो के किनारे हजारो रुपियो का इत्तर लगाये लड़के लडकियों को घंटो बतियाते भी मैंने ही देखा है.!

ऐ.सी कोच मे बैठ कर ठंडी का एहसास और आनंद लेते मैंने उसी कोच के बाहर गर्मी मैं झुलसते लोगो को देखा है ! न जाने मुझे क्या हो गया है जब से मैंने इस रेलवे ट्रेक को देखा है। जैसे रेलके दो ट्रेक आपस मैं कभी नहीं मिलते वैसे मेट्रो और रेल्वे ट्रेक की आसपास की संस्कृति भी शायद आपस मैं कभी नहीं मिल पाएगी...! न जाने मुझे क्या हो गया है जब से मैंने रेलवे ट्रेक को देखा है.!

Friday, July 9, 2010

बस ’कोलेज’ का नाम न लेना आई हेट ’कोलेज’ स्टोरी’स .!




विनय: क्या कर रहा है,संजु?

संजु: कुछ नही यार बोर हो रहा हूं, चल ना कही टाईम पास करने चलते है।

विनय: कहा चला जाय यार...ह..ममम....... चल ना कोलेज चलते है, मस्त टाईम पास होगा और मस्त मस्त
लड्किया भी होगी...।

संजु: यप.. कुल, ग्रेट आईडिया..लेट्स मीट धेयर।

ये संवाद मेरे दिमाग मे और जहन मे बहुत दिनो से घुम रहा है। आखिर अब विद्यार्थीओ के मन में कोलेज का क्या मतलब है? विद्यार्थी कोलेज जाते क्यूं है? क्या हो गया है मेरे नौजवान विद्यार्थी मित्रो को.? यदि ऐसा ही हाल रहा तो आने वाले दिनो मे कोलेज की पूरी व्याख्या ही बदल जायेगी।

आजकल के माहोल ने और पनप रही गुन्डागर्दि ने मुझे फ़िर से इस बात पर सोचने के लिये मजबूर कर दिया है कि क्या अब कोलेज का माहोल पुरे जीवन भर याद करने लायक है?( जैसा हम कर रहे है।) फिल-हाल तो कोलेज की परिभाषा ही पुरी तरह बद्ल चुकी है। ( शायद मै ओलड फेशन कहा जाऊंगा लेकिन मेरे जहन में कोलेज की जो यादें है उसे में हमेशा याद करता हूं।)

मेरे दिल मे ये सवाल ना जाने कब से गूंज रहा है कि आखिर इस कोलेज के वातावरण को किस की नजर लग गयी है? आज कल कोलेज में विद्यार्थी कम और अजब गजब कपडे पहने ’भाई’ टाईप के लोग क्यूं ज्यादा नजर आते है? विद्यार्थी नेताओ की फौज क्यों बढ रही है? कोलेजो मे पढाई की जगह तोड-फोड क्यों हो रही है ? क्या कारण है इस के पीछे ? ऐसे ’भाई’ और विद्यार्थी नेता विशेषत: आर्टस-कोमर्स-सायन्स फ़ेकल्टी वाली कोलेजो में क्युं ज्यादा नजर आते है?

मुजे जो कारण नजर आता है, वो शायद यह है कि कोलेजो मे आने वाले “ विद्यार्थीओ” की संख्या दिन प्रति दिन घट रही है। कोलेज मे दाखिला सब के लिये सुलभ बनाने के उत्साह मे हम ने सब के लिये उच्च शिक्षण के प्रवेश द्वार खोल दिये। इसका नतिजा ये हुआ की कोलेज मे नाम मात्र का दाखिला लेने वालो की संख्या दिनो दिन बढने लगी !
“ हरि को जो भजे सो हरि का होय”, उसी तर्ज पर जो फीस भर सके वो सब कोलेजियन होय। ऐसा प्रतित होने लगा। इसका नतिजा ये हुआ कि आज कल लोगो को पढ्ने के अलावा और बाकी सब कुछ करने का परमीट मिल गया। कोलेज केम्पस मे कोई भी बिना किसी फ़िक्र के बिन्दास घूम सकता है ( भाई अब रोकोगे कैसे जब उनके पास आई.डी.है)। प्रिन्सिपाल की अब पहले जैसी धाक तो रह नही गई ( या रहने नही दी गई, इस परिस्थिति का निर्माण करने के पीछे शायद हमारे माता-पिता या कुछ मेरे जैसे मिडियाकर्मी जिम्मेदार है, जो छोटे से छोटी बात को हेड-लाईन बना के बाई-लाईन ले लेते है।) सरस्वती–धाम मे पुलिस को तो आना मना ही है तो ऐसे मे इन “विद्यार्थीओ” के आई.डी. चेक कोन करेगा? ओर भूल से भी अगर कोलेज प्रशासन ऐसे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ़ कोई कार्यवाही करती है तो “ विद्यार्थी एकता जिन्दाबाद” के नारे गुंजने लगते है, और बन बैठे विद्यार्थी नेता कोलेज मे तोड्फोड कर हंगामा खडा कर देते है? और ऐसे विद्यार्थीओ के खिलाफ अपने आप को शरीफ विद्यार्थी मे गिनती करवाते लोग चुप-चाप शरीफ बन्दर की तरह सिर्फ तमाशा देखते रहते है।

मेरे एक मित्र को मैने पूछा (जो फिलहाल कोलेज मे पढ्ता है) कि आज कल इतनी गुन्डा-गर्दी क्यूं हो रही है? क्युं कोलेज का वातावरण बिगड्ता जा रहा है? उसने फ़िल्मी और पुरुष वाली मानसिकता से जवाब देते कहा कि” भैया आज कल की लडकीयो की वजह से ये सब हो रहा है ( मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन सुनता रहा ।) कोलेज की लडकीयां कोलेज केम्पस को फेशन परेड का स्थान समझने लगी है, एक कप कोफी,आइसक्रीम या फ़िल्म की खातिर आज कल की लड्कीया किसी भी लड्के के साथ कहीं भी जाने से परहेज नही कर रही है, बिन्दास जो कहलाना है।किसी भी लड्के की गाडी मे बैठ कर कही भी चल देती है। लड्कियो मे अब बोयफ़्रेंड बनाने कि एक होड सी लगी है, इस होड मे वो लड्को का बेक-ग्राउन्ड जाने बिना कही भी चल पडती है, और नतीजा आप के सामने है भैया। ( अब इस को क्या कहु पुरुष विरोधी मानसिकता या स्त्री विरोधी मानसिकता।) खैर बात आगे बढाते है,

आज कल कोलेज का वातावरण बिगाड्ने के पीछे कोलेज के ही कुछ “भुत” पुर्व विद्यार्थीओ का भी बहुत बडा हाथ है। जिनको कोलेज के अन्दर के ही विद्यार्थी पालते-पोसते है। और ऐसे“भुत” पुर्व विद्यार्थीओ के साथ एक बहोत बडी खुशामत खोरो की टोली भी होती है, जो जरुरत पड्ने पर कोलेज के कुछ विद्यार्थीओ को डराती धमकाती है, और उस की टोली मे शामिल कोलेज के विद्यार्थी की मदद करती है।( ओर फिर बदले मे उस से ना जाने क्या क्या करवाते है।) आज कल लडके लडकिंया घर से निकल कर कोलेज ही जाते है ऐसा नही है वो अब ज्यादातर किसी सिनेमा-घरो मे या किसी-ना-किसी कपल-रूम मे पाये जाते है।( मेरी बात की पुस्टि के लिये गुजरात के किसी भी कपल रूम मे या होट्ल मे पडी रेड का इतिहास खगांल लिजीये आप को सबूत मिल जायेगा की ऐसे किस्सो मे ज्यादातर कौन पक्डे जाते है।)

३५-४०% या एक से अधिक बार ट्रायल दे कर पास होने वाले विद्यार्थी कोलेज मे दाखिल नही होगे तो सरस्वती माता की वीणा के तार को कोई नुक्सान नही होगा। जो लोग सिर्फ फैशन की खातिर,घुमने फिरने की खातिर,टाईम पास करने की खातिर या फिर ’स्नातक’ का लेबल लेने की खातिर कोलेज मे मुह उठाये चले आते है उन्हे रोकना ही होगा,नही तो इस आधुनिकता और आधुनिक विद्यार्थीओ के प्रलय के बहाव मे सिर्फ युवाधन ही नही उच्च-शिक्षण की पुरी व्यवस्था डुब कर बह जायेगी।

विषेश सुचना: यह लेख लिख ही रहा था कि खबर मिली है की अहमदाबाद के एक कोलेज के २ लडको ने दारु पीकर कोलेज मे खूब हंगामा खडा किया और तोड फ़ोड की ( खबर जुलाई ९-२०१० की है। जगह अहमदाबाद गुजरात है।)

Saturday, June 26, 2010

!.....ओनर किलिंग कल आज और कल.....!



ओनर किलिंग-ओनर किलिंग आज कल मीडिया और सामान्य लोगो के बीच ये एक बहोत ही चर्चास्पद विषय बन गया है|कई लोगो को तो ये शब्द पता ही नहीं था की इसका मतलब क्या होता है?शुक्र है हमारी मीडिया ने सब को समझा दिया|
कोई भी घटना आज कल जो हत्या से जुडी हो उसको सब से पहले ओनर किलिंग से ही जोड़ा जाता है(भले चाहे वो हो न हो,आखिरकार टी.आर.पी का जो सवाल है फ़िल-हाल ओनर किलिंग या उससे जुडे मुद्दे सब से ज्यादा टी.आर.पी दिला रहे है। और ऐसे कई सारे मुद्दे है जो सिर्फ टी.आर.पी के लिए मीडिया मैं चलाये जा रहे है मैं यहाँ उन सब की बात कर के आप का टाइम नहीं बिगड़ना चाहता, सब को पता है। और मैं ये बात भी साफ़ कर देना चाहता हूँ की मैं कोई ओनर किलिंग के समर्थन मे नहीं हूँ। “जिंदगी हमेशा मौत से बड़ी होती है”।)

बात ओनर किलिंग की हो रही है तो मैं भी क्यूँ न ज्ञान दे ही दूँ। ( भले मुझे कुछ पता हो न हो, आखिर कार ब्लॉग की टी.आर.पी का जो सवाल है।)

ये ओनर किलिंग का भूत आया कहाँ से? अगर आप एक नजर अपने समाज की रचना पर और उसके इतहास पर डाले तो ये कही न कही हमारे पुरुष प्रधान समाज की ही देन है या रही होगी। जिस देश मे स्त्री और पुरुष के बीच अ-समानता की खाई ज्यादा हो,जिस समाज मे स्त्री को एक अधिकार के रूप मे माना जाता हो,जिस देश मे स्त्री को पुरष द्वारा अधिकार दिए जाते हो वहीँ ओनर किलिंग होगी या वहीं ओनर किलिंग के किस्से ज्यादा मिलेंगे।( रही भारत की बात तो भारत मे स्त्री भगवान के स्वरूप मे पूजी जाती है,और वोही स्त्री को दहेज़ के नाम पर जलाई भी जाती है,ओनर किलिंग के नाम पर उसी-के जन्मदाता ओ द्वारा मारा भी जाता है| मुझे ये समझ मे नहीं आता की जिस कलाई पर बहन ने प्यार से राखी बाँधी हो उसी कलाई से उसका कतल कैसे हो शकता है? जिस पिता को नौकरी से या अपने काम-काज से थक हार कर घर पर आते ही प्यार से पानी पिलाया हो उसी हाथ से उनको मारने की हिम्मत कहाँ से आती है?घर के ही लोगो की लाश पर गर्वे से केमरे पर बाईट देने की ताकत कौन देता है।)
अगर आप मानते हो की ये ओनर किलिंग सिर्फ भारत मैं ही है तो आप खुद एक भ्रम मे है। ये ओनर किलिंग अपने पडोसी देश पाकिस्तान मे भी हो रही है।( जो की वहां की मीडिया उनके समर्थन मे है,इस लिए ऐसे किस्से लोगो के ध्यान पर बहोत कम आते है या आने दिए जाते है |) इस के अलावा तुर्की,जोर्डन,लेटिनअमेरिका,कुवैत,बंगलादेश और कई सारे देशो मे ओनर किलिंग हो रही है।

पाकिस्तान मे तो सिर्फ चार वर्षो मैं ४,०००० से भी ज्यादा महिलाओ की हत्या सिर्फ ओनरकिलिंग के नाम पर हुई है। दिन बा दिन ये घटना ये वहां बढती ही जा रही है।ऐसा नहीं है की वहां इसके खिलाफ आवज नही उठती, आवाज तो उठती है,लेकिन उसे एक या दुसरे तरीके से दबा दी जाती है या तो फिर ऐसी घटना ओ को बाहर नहीं आने दिया जाता। अब तो हाल ये है की आधुनिक कहे जाने वाले अमेरिका केनेडा फ़्रांस जर्मनी यू.के. मे भी ओनर किलिंग के किस्से हो रहे है। ( हम हर चीज मैं अमरीका जैसा बनने की कोशिश करते है लेकिन इस घटना क्रम मे शायद अमेरिका और दुसरे देश हमारी कॉपी कर रहे है।)
ऐसा नहीं है की इस से पहले भारत मे या और देशो मे ओनर किलिंग नहीं होती थी|
एक नजर पहले के ज़माने पर डाले तो जब लडकियां पैदा होती थी तो उन्हें दूध मे डुबो कर मार दिया जाता था।( ये कौन सी किलिंग थी),औरतो को दहेज़ के नाम पर,दूसरी जाती मे विवाहों के नाम पर पहले भी मारा जाता था, ना जाने कितनी खाप पंचायतो ने और फ़त्वो ने इज्जत के नाम पर हत्याये करवाई है ( ये भी मेरी नजर से ओनर किलिंग ही है।)
फर्क सिर्फ इतना है पहले ऐसी घटनाओ को दबा दिया जाता था या दब जाती थी, आज दबाने से भी नहीं दब रही है।

ओनर किलिंग की बदी आज-कल से नहीं सदियों से चली आ रही है फर्क सिर्फ इतना है समय समय पर इस घटना ने अलग नाम का चोला पहना है| अंध पुरषोत्तम प्रधान समाज मे कोई शख्त कानुनों से ये बदी दूर नहीं हो जायेगी इस के लिए हमें सब से पहले हमारे इस अंधे समाज के माइंड सेट को बदलना होगा। इस जूठे इज्जत के भ्रम को तोडना होगा। महिलाओ को सम्मान से जीने देना होगा। इस को दूर करने के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़नी होगी, जन जागृति लानी होगी,तभी ये पेट्रोल और गेस की कीमतों की तरह बढ़ता काले-नाग की तरफ फन फैलता ओनर किलिंग का भूत थमेगा।न की जल्दी जल्दी पी.टु.सी देने से या हाफ्ते-हाफ्ते बोलने से।

चलिए बहोत लिख लिया कोई ओनर किलिंग का किस्सा ढूँढना है या बनाना है चैनल की टी.आर.पी. जो बढानी है।

Saturday, June 12, 2010

याद रखना मैं एक पत्रकार हूँ.....!



याद रखना मैं एक पत्रकार हूँ.....!

जब से मैं इस क्षेत्र मैं आया हूँ तब से कहीं न कही ये किसी न किसी रूप मे ये शब्द मुझे सुनाई दे ही जाता है..! कभी इस मे अभिमान छिपा हुआ होता है,तो कभी इस मे गर्व छिपा होता है तो कभी कभार केमरे के पीछे की लाचारी भी इसी शब्द के रूप मै पिस टु केमेरा दे जाती है...!...

लेकिन पिछले कुछ दिनों से यही प्रश्न मैं बार बार सोचता रहा की आखिर पत्रकार यानि क्या..?! ( जब की मैं खुद एक पत्रकार बनने की कोशिश कर रहा हूँ।)इस सन्दर्भ मे मैं आप को एक घट्ना बताना चाहुंगा।

कुछ दिन पहले मेरे एक पत्रकार मित्र को घर लेना था। बहोत खुश था वो क्युंकी उसके जीवन का एक बहोत बड़ा सपना सच होने जा रहा था।उसने अपने कुछ दिनों की बचत और कुछ माँ बाप की बचत से घर लेनी की सोची थी। लेकिन वो इतनी नहीं थी की उस से वो घर खरीद ले।लिहाजा उस ने बैंक लोंन ले कर घर लेने की ठानी। हम साथ साथ बैंक गए,बेंक वाले ने जैसे मेहमान की तरह खातिर दारीकी, सब बात ख़तम होने पर जब जॉब का आप्शन आया तो उसे देखते ही हमे लोन देने के लिये उत्सुक उस शक्स के आँखों की भोंवे तन गई। कुछ हक-पकाया और बोला थोड़ी देर आप बैठो मैं अभी आया। कुछ देर इंतजार करने के बाद जब वो लौटा तो उसने अपने चहरे पर एक कमिनी सी मुस्कान लाते हुए कह दिया सॉरी सर हम आप को लोंन नहीं दे शकते। हमारी बैंक का नियम है की हम पत्रकारों को लोंन नहीं देते। सुनते ही हम लोग बहोत चीखे चिलाये पर कुछ न हुआ,अंत मैं चुप चाप वहां से निकल आये ,उस के बाद हमने कई बेंको के चक्कर काटे हर जगह एक ही जवाब मिला शोरी और वो भी उसी कमीनि मुस्कान के साथ। और अब मेरे उस पत्रकार मित्र का घर लेने का सपना सपना ही रह गया है आज तक...( क्यूँ की वो इमानदारी से सिर्फ पत्रकारिता ही करता है) | शायद ऐसा और कईओ के साथ हुआ हो लेकिन मुझे पता नहि।

बड़ी बड़ी समाज सुधार की बाते करते और सरकार पलट देने का हौंसला दिखाने वाले पत्रकार की क्या यही इज्जत है? खुद सरकार कि बनाई बेंक भी उन पर विश्वास नहीं करती भैया तो औरो से क्या आशा रखें।
चाय या कोफी की प्याली के घुंट मारते हुए मित्रो के सामने गर्व से बोलते मैंने कई लोगो को सुना है की मैं पत्रकार हूँ बड़े बड़े लोग मेरे एक फ़ोन से कांप उठते है। क्या यही पत्रकार की इज्जत है?( ये तो उसका ही मन जानता होगा की एडिटर का फ़ोन आते ही कौन कांप उठता है.. उसकी क्या हैसियत है ये तो न्यूज़ रूम या न्यूज़ डेस्क पे जाने से ही पता चलती है) मुझे यही नहीं समझ आता की किस भ्रम मैं है ये पत्रकार। कही भी ट्राफिक पुलिस ने पकड लिया तो प्रेस का कार्ड दिखा के धमकी देते मैंने कई पत्रकारो को देखा है,और यह कह्ते भी सुना है की तुम्हारे खिलाफ लिखना होगा,( जैसे सारे न्युज चेनल की स्टोरी या न्युज पेपर की स्टोरी वो ही तय करता है।) फिर उन्ही लोगो को इमानदारी के कई सारे लेक्चर देते भी मैने सुना है। कया ऐसा दो मुहा है पत्रकार? आज पत्रकार की क्या हैसियत रह गई है.?? पत्रकार शब्द के माइने क्या है?
मैं नहीं जानता लेकिन कुछ दिनों पहले मैं एक गाँव गया था, वहां एक बूढ़े आदमीं ने पुछ लिया बेटा क्या करते हो ? अपन ने शान से कह दिया (मेरे जैसे शायद सब न कहते हो) पत्रकार हूँ! जरा भी देरी किये बिना उन्हों ने झटसे कह दिया..क्या और कोई काम नहीं मिला था.! ( ये है एक बुजुर्ग की दर्ष्टी से पत्रकार।)

मेरे दोस्त के भाई का फ़ोन आया की “जर्नालिसम” करना चाह्ता हूँ। मैंने उस से पुछा “जर्नालिसम” ही क्यूँ?(पत्रकारीता के गुणधर्म के मुताबिक।) उस ने बड़े ठन्डे कलेजे से कहा की वैसे तो एक्टर बनना चाहता था लेकिन चांस नहीं दीखता तो “जर्नालिसम” ही कर लुं। पत्रकारों के आज कल बहोत ठाठ है..!(वो शायद पत्रकारीता को ग्लेमर के नजरिये से देख रहा था। ये है जर्नालिसम मैं आने वाली पीढ़ी की नजर से एक पत्रकार.!)
( ये लोग ऐशा सोचे उसमें कोई गलत नहीं है क्यूंकि मैंने खुद कई जाने-माने पत्रकारों को गिफ्ट-वाउचर के लिए झगड़ते और कई सरकारी और गैर सरकारी लोगो की बदलियों के लिए मंत्रियो से सिफारिश करते देखा है,फिर वो इज्जत कहा से पाएंगे?)

आज कल नौकरी तन्खवाह छ्ट्नी,लोबिंग और ना जाने किन किन बलाओ से जुझते है पत्रकार,लेकिन बहार दिखावा तो ऐसे करते है जैसे सब कुछ है पत्रकार...! पत्रकार की इज्जत भी दिन बा दिन घटती हि जा रहि है,उन्हे ऐसे ऐसे शब्दो से नवाजा जाता है कि उसे मै यहां नही लिख सकता।( कई सारी बिप बजानी होगी जो यहां नही बजेगी।) इसके लिये जिमेदार कौन है ये भी मै नही जनता।
वैसे तो बहोत कुछ लिखना था लेकिन क्या करूँ मैं भी एक पत्रकार बन रहा हूँ ! पढ़ कर आप क्या सोचते हो पत्रकारों के बारे मैं जरूर लिखना वर्ना याद रखना मैं भी एक पत्रकार हूँ.....!