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Thursday, January 12, 2012

स्वामी विवेकानंद का भाषण





स्वामी विवेकानंद द्वारा,1893 में Parliament of Religions, Chicago में दी गयी inspirational speech HINDI में share कर रहा हुं.ये वही भाषण है जिसने स्वामी जी की ख्याति पूरे विश्व में फैला दी थी और Parliament of Religions में हिंदुत्व और भारत का परचम लहरा दिया था.
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अमेरिकी बहनों और भाइयों.....

आपके इस स्नेह्पूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय आपार हर्ष से भर गया है.मैं आपको दुनिया के सबसे पौराणिक भिक्षुओं कि तरफ से धन्यवाद् देता हूँ.; मैं आपको सभी धर्मों की जननी कि तरफ से धन्यवाद् देता हूँ , और मैं आपको सभी जाति-संप्रदाय के लाखों-करोड़ों हिन्दुओं कि तरफ से धन्यवाद् देता हूँ.मेरा धन्यवाद् उन वक्ताओं को भी जिन्होंने ने इस मंच से यह कहा है कि दुनिया में शहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है . मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ जिसने दुनिया को शहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति (universal acceptance) का पाठ पढाया है.हम सिर्फ सार्वभौमिक शहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं. मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूँ जिसने इस धरती के सभी देशों के सताए गए लोगों को शरण दी है.मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इस्राइलियों के शुद्धतम स्मृतियाँ बचा कर रख्हीं हैं, जिनके मंदिरों को रोमनों ने तोड़-तोड़ कर खँडहर बना दिया, और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली. मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ जिसने महान पारसी देश के अवशेषों को शरण दी और अभी भी उन्हें बढ़ावा दे रहा है. भाइयों मैं आपको एक श्लोक कि कुछ पंक्तियाँ सुनाना चाहूँगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है, और जो रोज करोडो लोगो द्वारा हर दिन दोहराया जाता है.” जिस तरह से विभिन्न धाराओं कि उत्पत्ति विभिन्न स्रोतों से होती है उसी प्रकार मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है, वो देखने में भले सीधा या टेढ़े-मेढ़े लगे पर सभी भगवान तक ही जाते हैं. “

वर्तमान सम्मलेन , जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, स्वयं में गीता में बताये गए एक सिद्धांत का प्रमाण है , “जो भी मुझ तक आता है ; चाहे किसी भी रूप में , मैं उस तक पहुँचता हूँ , सभी मनुष्य विभिन्न मार्गों पे संघर्ष कर रहे हैं जिसका अंत मुझ में है .” सांप्रदायिकता, कट्टरता, और इसके भयानक वंशज, हठधर्मिता लम्बे समय से प्रथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं. इन्होने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है , कितनी बार ही ये धरती खून से लाल हुई है , कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और कितने देश नष्ट हुए हैं.

अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता. लेकिन अब उनका समय पूरा हो चूका है, मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंख नाद सभी हठधर्मिता,हर तरह के क्लेश ,चाहे वो तलवार से हों या कलम से, और हर एक मनुष्य, जो एक ही लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे हैं ; के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा.

Swami Vivekananda’s Address/Speech to the World Parliament of Religions,
11th September, 1893

Saturday, November 5, 2011

You may not be her first, her last, or her only


You may not be her first, her last, or her only .

she loved before she may love again. But if she loves you now, what else matters? She’s not perfect –you aren’t either and the two of you may never be perfect – you aren’t either and the two of you may never be perfect together but if she can make you laugh ,

cause you to think twice and admit to being human and making mistakes, hold on to her and give her the most you can .
she may not be thinking about you every second of the day but she will gives you a part of her that she knows you can break her heat so don’t hurt her don’t change her, don’t analyze and don’t expect more than she can give.

Smile when she makes you happy, let her know when she makes you mad, and miss her when she’s not there 

Thursday, September 8, 2011

WOMEN THROUGH MY EYES



Tomorrow you may get a working woman,
but you should marry her with these facts as well.

Here is a girl, who is as much educated as you are; Who is earning almost as much as you do;
One, who has dreams and aspirations just as you have because she is as human as you are;
One, who has never entered the kitchen in her life just like you or your
Sister haven't,
as she was busy in studies and competing in a system
that gives no special concession to girls for their culinary achievements
One, who has lived and loved her parents & brothers & sisters, almost as
much as you do for 20-25 years of her life;

One, who has bravely agreed to leave behind all that, her home, people who love her, to adopt your home, your family, your ways and even your family , name
One, who is somehow expected to be a master-chef from day #1, while you sleep oblivious to her predicament in her new circumstances, environment and that kitchen

One, who is expected to make the tea, first thing in the morning and cook
food at the end of the day, even if she is as tired as you are, maybe more,
and yet never ever expected to complain; to be a servant, a cook, a mother,
a wife, even if she doesn't want to; and is learning just like you are as
to what you want from her; and is clumsy and sloppy at times and knows that you won't like it if she is too demanding, or if she learns faster than you;

One, who has her own set of friends, and that includes boys and even men at her workplace too, those, who she knows from school days and yet is willing to put all th at on the back-burners to avoid your irrational jealousy, unnecessary competition and your inherent insecurities;
Yes, she can drink and dance just as well as you can, but won't, simply
because you won't like it, even though you say otherwise One, who can be late from work once in a while when deadlines, just like yours, are to be met;

One, who is doing her level best and wants to make this most important,
relationship in her entire life a grand success, if you just help her some
and trust her;

One, who just wants one thing from you, as you are the only one she knows in your entire house - your unstinted support, your sensitivities and most importantly - your understanding, or love, if you may call it.
Please appreciate "HER"

NOTE : THIS ARTICLE IS NOT WRITTEN BY ME

Sunday, July 31, 2011

अर्धांगिनी :



रात के २ बज रहे थे धीमी धीमी बारिश हो रही थी मैं भी अपनी मस्ती में मस्त बाईक चलाते-चलाते जा रहा था की आईआईएम के पास अचानक ही एक पागल सी लड़की दौड़ते हुए रोड क्रोस की और मैंने अपना बेलेंस खो दिया| जैसे तैसे मैंने अपने आप को और बाईक को सभाला गुस्से में मैं कुछ वो लड़की को कहूँ उस से पहले एक लड़का सामने आया और सॉरी कहने लगा| मैंने कहा भाई आप क्यूँ सॉरी कह रहे हो, तो उस ने कहाँ जिस ने आप को गिराया है वो मेरी पत्नी है| जैसे ही उसने ये कहा तो पत्रकारिता का खून दौड़ने लगा| ढेर सारे प्रश्न दिमाग में गुंजने लगे की ये लड़का तो ठीक-ठाक लग रहा है तो फिर ऐसी लड़की के साथ क्यूँ? वो भी इतनी रात को ? अपने मन में होते प्रश्न को रोक नहीं पाया तो आखिर कार उस लड़के से एक एक कर सारे प्रश्न पूछना शुरू कर दिया|लड़के ने भी बड़े प्रेम से बिना किसी हिचकिचाहट के सारे जवाब दिए|जिसे सुन कर उस कपल के प्रति दिल में मान-समान बहोत बढ़ गया|आप को पूरा वार्ता लाप सुनाता हूँ:

लड़के से पूछा की आप तो अच्छे लगते हो तो फिर इस लड़की से शादी क्यूँ की? उसका जवाब दिल को हिला देने वाला था|लड़के ने बताया की भाई जब मैंने इस से शादी की थी तब ये ऐसी नहीं थी|एक खूब सूरत और एक लड़के को जैसी पत्नी चाहिए वैसी थी| हमारी लव कम अरेंज मेरेज थी| इस से हमारा सारा परिवार खुश था | हमेशा सब को हँसाना हस्ते रहना इस की फिदरत थी|शाद्दी के कुछ ही दिनों में ये हमारे घर की शान जान और आन बन गयी थी | मुझे भी हमेशा यही आनंद होता की मैं इस दुनिया का सब से खुशनसीब इन्सान हूँ की ऐसी पत्नी मिली| समय बीतता गया और हमारे घर में और मेरे दिल में इस का प्यार गहराता गया|

पर ये बोहत ही मस्तीखोर और मेरे साथ थोड़ी सी जिद्दी थी | एक दिन रात को २ बजे मुझे कहा की बारिश हो रही है मुझे बाहर घुमने जाना है मैंने लाख मना किया लेकिन उस के आगे मेरी एक न चली | आखिर कार मैंने गाड़ी निकाली और निकल पड़ा घुमने | जैसे ही बहार निकला वैसे ही एक और जिद शुरू की के आज तक आप ने गाडी कभी तेज नहीं चलायी आज चलाओ मुझे आज गाडी की स्पीड देखनी है फिर मैंने मना किया लेकिन मेरी एक न चली वैसे भी उस की हर जिद को पूरा करना मैं अपना प्रेम समझता था| फिर गाड़ी तेज भगाना शुरू की एक दम फास्ट गाड़ी जाने लगी वो भी खूब खुश हो रही थी मैं भी उसे देख एक दम खुश हो रहा था| एक दुसरे को देख ही रहे थे की अचानक से एक कुत्ता सामने आया मैं ब्रेक मारू उस से पहले ही इस ने गाड़ी के कांच खोल जोर जोर से चिल्लाना शुरू किया कुत्ते को बचाने के चक्कर में आखिर कार मैंने कंट्रोल खो दिया और गाड़ी सामने खम्भे जा टकराई|ये गाड़ी के कांच खोल कर बहार थी तो सारे कांच के टुकड़े और खम्भा इस के सर से जा टकराया और मैं भी गाडी में बेहोस पड़ा रहा फिर कौन हमें अस्पताल ले आया कुछ पता नहीं |मैं तो जल्दी ठीक हो गया पर इसे सर में कांच घुसने और खम्भे की वजह से जयादा चोट लगी थी| एक साल तक कोमा में रही फिर धीमे धीमे ठीक तो हुई पर आज भी ये 'अनकोनसियस'है कुछ पता नहीं होता इसे की ये क्या कर रही है? क्या खाना है? क्या पहनना है कुछ भी नहीं| मुझे ही इसके सारे काम करने पड़ते है| इसकी वजह से मेरे घर में भी कई बार झगड़े हुए की अब इस पागल के साथ क्यूँ जिदगी बिगाड़ रहा है? पागल खाने छोड़ आ या तो इस के मायके भेज दे | पागल के सहारे जिन्दगी नहीं जी जाती| मेरे माँ बाप से इसी को लेकर रोज रोज झगड़े होने लगे |

बात को रोकते हुए उस ने पूछ लिया की भाई आप ही बताओ क्या इसी अवस्था में इसे छोड़ देना ही मेरा पति का कर्तव्य है? क्यूँ छोड़ दूँ इसको भला? शायद इस की जगह मैं होता तो? मेरे पास कोई जवाब नहीं था सिर्फ आंशु निकले आँखों से. ..

बात को फिर आगे उसने बढाया कहा की जब तक ठीक थी तब तक सारे लोग इस के गुणगान गाते नहीं थकते थे आज इस को जब सच में इन लोगो की जरूरत हुई तो फिर सब ने तो छोड़ दिया मैं कहाँ चला जाऊं इसे छोड़ कर|
मेरे माँ बाप का बिहेवियर मुझ से सहन नहीं हुआ तो इस को लेकर घर छोड़ चला आया | समस्याये कई थी| फिर मुझे रोज इस का रूटीन देखना पड़ता था रोज रोज ऑफिस लेट जाने लगा ऑफिस जाने के बाद भी चिंता यही लगी रहती की कही कुछ उस को जरूरत हुई तो? केयरटेकर कितना ध्यान देगी? मेरा जी वहीँ लगा रहता| इसी चक्कर में ऑफिस लेट जाने लगा ऑफिस में भी प्रोब्लम होने लगी | फिर एक दिन नक्की किया के नहीं अब ये भी छोड़ इसके साथ ही रहना है | घर से ही फिर कुछ कर ने का सोचा| एक छोटा मोटा व्यापार कर रहा हूँ फिल हाल| घर से और दोस्तों की मदद से व्यापर भी चल रहा है|पुरे दिन इस के साथ भी रह पता हूँ|ये सब सुनकर मैं वैसे ही रो रहा था की उस ने बोला भाई आप क्यूँ दुखी होते हो? यही तो मेरा धरम था यही मैं कर रहा हूँ इस में दुखी होने की कोई बात नहीं है|आप चिंता मत करो |

फिर मैंने उस से पूछा की फिर आज इतनी रात को इस रोड पर क्या कर रहे हो तो उस ने कहा की बताया न भाई इसे बारिश बहोत पसंद थी तो आज बारिश हो रही थी वो भी पहली तो सोचा घुमा लाऊं और बाहर लेकर आने के बाद अब ये घर नहीं जाना चाहती तो इस को लेकर बैठा हूँ | बस अब यही मेरी जिन्दगी यही मेरी अर्धांगिनी है| और इसके सिवा और मेरा कोई है ऐसा मैं मानता भी नहीं |

सच में इस लड़के की बात सुन कर घर जा कर मैं भी खूब रोया और आनंद भी हुआ की प्यार सिर्फ फिल्मो और कहानियो में नहीं बचा सच में कई इन्सान प्यार को जी भी रहे है और निभा भी रहे है | सारी बाते सुनकर हमेशा से जो मेरे दिमाग मैं प्रश्न होता था की प्यार क्या है? वो एक दम साफ़ हो गया|

Wednesday, June 15, 2011

दिल के अरमान निकले.!!



कभी होती थी हँसी भी मेरे फोटो पर,
आज भीड़ में भी मुझे दर्द-ऐ-दिल हुआ करता है.
मेरे जीने की आरजू करते थे कभी, मेरे दुश्मन भी,
आज मेरा हमदर्द ही मेरे मरने की दुआ करता है.

समझता था ख़ुद को खुशनसीब जिसे मेरे दिल में पनाह मिलती थी,
आज अश्क भी मेरी आंखों में ख़ुद को बेपनाह समझता है.
खूबसूरत होता था हर वो नगमा जो मैं कलम से लिखता था,
आज लहू से लिखा "प्यार" भी सब को अल्फाज़ नजर आता है.

कभी जीता था मेरा कातिल भी मेरे जीने की उम्मीद में,
आज मेरा दिल भी मेरे मरने की दुआ करता है.
क्या होती है बेवफाई ये सिर्फ किताबों में पढ़ा करता था ,
आज हर लम्हा मेरी मोहब्बत के लिए तड़पता है.

Thursday, May 26, 2011

कभी यहाँ भी एक बस्ती बसती थी....!!



कल जो बस्ती गिराई गई उस बस्ती में मेरा कोई नहीं था|
औरतें बच्चें बूढ़े और कई लोग जिनके सर पर इस झुलसती धुप के सोले गिर रहे थे उन मेसे मेरा कोई नहीं था।

स्कूल जो कभी कच्चा-पक्का था,जो बनते बनते इक मोल बनकर कई बच्चों का जीवन झुलसा गया उनमे से मेरा कोई नहीं था । में तो कोंनवेंट स्कूल मे पढ़ा था |

उन स्कुल में,मैं या मेरे घर से कोई कभी पढने न गया है और न ही जायेगा क्या पता उनका स्टान्ड्रड देख हम लोग लज्जा जायेंगे|

उस ओर जिस ईमारत की नीव खोदते खोदते अपनी कबर खोद खुद दफ़न हो गया उन मजुरो में मेरा कोई नहीं था मैं तो अपने आलिशान बंगले मे ऐ.सी.ओन कर के आराम से सोता हुं |

मेरी कोई दुकान कभी नहीं टूटी , मेरा कोई घर कभी नहीं टुटा मैं तो बस दूर से दुसरो के घर को टूटते देखता रहा और देखता रहता हुं।

ये सब ख्याल मेरे दिमाग मे चल रहे थे तभी कहीं अचानक से मेरा दिल जोर से धड़का जैसे मुझसे बोला तू क्यूँ बेकार का परेशान होता है इन सब मैं कहाँ कोई तेरा था जो इतना मायूस होता है|

Monday, May 9, 2011

सपनो की रानी



लिखना चाह्ता हुं तुझे प्यार भरे खत ऐ सपनो की रानी बता तुझे कैसे लिखुं?
हर सुबह तुझे ही देखना चाह्ता हुं ऐ मेरे सनम तु ही बता कैसे तुझे देखुं?
हर बात पर करना चाहता हुं तुझे याद है तुझे भी पता मेरे पास तो तेरी कोई याद भी नही।

जाने किस फुलों की तरह मुस्काती है तु, न जाने किस दिन के चांद की तरह है तेरी सुरत? मेरे पास तो तेरी कोई तस्वीर ही नहीं । न जाने किस शबनमी रात की तरह है तेरे आंसू मेरे पास तो तेरे कोई गम भी नहीं।

कया तेरे सुख पर किसी के प्यार का घुंघट पडा है या मेरी तरह तु भी तलाश रही है कोई प्यारी सी छांव। क्या तेरा भी है कोई सपनों का राजकुमार है या की मेरी तरह तेरा भी कोई सपना ही नहीं।

मुझे कुछ भी मालुम नही की कौन है तु? कहां है तु? कैसी है तु? तेरे बारे मे हर तरह से अनजान हुं मै। और क्या कहुं तेरे गुलाबी होठों के निकट सिर्फ़ बेजुबान हुं मै।

न मेरे पास तेरा कोई निशां है न तेरे पास मेरा, तेरे लिये तो सिर्फ बेनिशान हुं मै। ऐ सनम अब तु ही बता कैसे तुझे पुकारूं? किन सितारो में तुझे निहारूं ? किन हवाओं से पुछुं तेरा नाम तेरे लिय्र अब तो सिर्फ़ गुमनाम हुं मै।
बस छ्म छ्म करती आ जाओ मेरे जीवन मे मेरे पास तुम्हारे सिवा कुछ भी नहीं।

Thursday, April 14, 2011

आखरी ख़त...



आज का आखरी ख़त सोचा लिख ही दूँ कल फिर ये सुबह मिले न मिले,

गरीबी ,भूख , भ्रष्टाचार से दबे देश का दुःख देख लगता है की कहीं ये मुझे अपने आप से ही बागी न कर दे| यहाँ हर रोज कोई न कोई जुलम की छाहं में दम तोड़ता है ,हर रोज यहाँ न जाने कितने निर्दोषों का लहू सडको पर पानी की तरह बहता है| इन घट्नाओं को देख सदा डर लगा रहता है की कहीं मेरे विचार मुझ से ही बगावत न कर दे|
न जाने कितनी चूड़ियाँ टूटती है इस देश की नंगी सडको पर न जाने कितने हाथो में महेंदी कभी रंग लाती ही नहीं|

आये दिन अखबारों मे दिख जातें हैं दबी,कुचली,लटकी लाशो के फोटो, इन फोटो से किसी का दिल पसिजता हो की न हो लेकिन मेरा दिल विचलित हो जाता है और ये डर लगता है की कहीं मेरा दिल धड़कना ही न छोड़ दे |
हर रोज नसे में झुलसती है कई युवको की जिंदगीयां कही ये झुलसन मेरे देश के नौजवानों को नसेड़ी ही न कर दे ?

हर सुबह होते ही किसी न किसी का कोई न कोई द्वार सुना हो जाता है हर आंगन मुझे सिसकता दिखाई देता है, क्या करूँ ? क्या करूँगा ? यही सोच हर दिन बस चुपके से मरता रहता हुं | क्या यही मेरा फर्ज है ? क्या सब कुछ देख चुपचाप सहन करना ही मेरे फर्ज की ललकार है? मैं खुद किसी का हमराह हुं या गुमराह हुं यही तय नहीं कर पाया तो अब इस देश को क्या रस्ता दिखाऊंगा ?

इसी लिए ऐ देश सोचा आज तुझे आखरी खत लिख ही दूँ शायद कल मैं भी भ्रष्ट हो ही जाऊं ?आज दिल दहलता है तो टकरा जाऊं हर जुलम की तलवार से कल कहीं मेरा खून ठंडा न पड जाए ? ऐ वतन तेरी सन्दली बाँहों की कसम अगर इस जिंदगी मे अपने दम पर जिंदा लौट आया तो फिर एक नया भारत जरूर बसाऊंगा| फिल हाल तो यही सोच रहा हुं इस आखरी ख़त को किसे भेजुं , खुद ही पढुं, या फिर जला कर इस की राख खुद ही पी जाऊं |

जाते जाते:
मैं कोशिश करना चाह रहा था कि गिरते हुये इक पेड को रोकुं, कमबख्त जब तक जेह्न मे ये विचार आया तब तक लोग उसे पहुंचा चुके थे कारखाने में।

Saturday, February 26, 2011

उम्मींदो का आसमां


मैं चला था ईक नया जहां बनाने अपनी उम्मींदो का नया आसमां बनाने, मुझे कहां पता था यहां आसमानो के भी ठेकेदार होतें हैं जिन पर घमंड के बाद्ल छाये होतें हैं। किन्तु इनपर घमंड से सनी धनक कौन चढ के साफ़ करे, “ज्ञान-रूपी” अभिमान के इनको जालें लग चुकें हैं, रुपयों की श्याही का ईनको ठप्पा लग चुका है। कोई अगर उसे मिटाने की कोशिश भी करता है तो अभिमान की गर्द उड्ने लगती है।

वो अपना फ़लक खोल परिवर्तन की लहर को महसुस नही करना चाह्ते है,कहीं नाकामी की धुप जलाकर राख न कर दे। पुरातन विचारो के इतने पत्तों ने घेरा हुआ है इन्हे की शाखों पर बद्लाव के परिंदे बैठ्ते ही नहीं ( य़ा बैठ्ने नही देना चाह रहें है)।

अब कैसे उम्मीद पालुं, कैसे खोलुं दिलों के राज, कैसे उडाऊं अपनी आशाओं के परिंदे, यहां तो हर डाल पर बैठा है शैयाद । मुझे फ़िर लौट कर चले जाना है इक अनंत यात्रा पर ये मालूम है, क्या करे जालिम ये दिल ही नही मानता के हर वख्त कि इक शाम होगी ऐसे लोगों कि खास जिंदगी भी कभी आम होगी।
ये तो मेरी बे लगाम ख्वाहिशें हैं जो मुझे दौडाती रहती हैं, वर्ना कौन चाहता है सुरज के चमकीले उजालों में अंधेरे की नाजायज औलादें ढुंढ्ना।

दुख तो हमेशा मुझे यही रहेगा की वो हमे समझते ही नही, हो जातें है बेववजह हमसे खफा उन्हे महसुस होता है शायद मैं यहा कुछ लेने आया हुं, उन्हे कौन बताये सनम मैं यहां तो क्या कहीं भी कुछ लेने आया ही नही था।
ऐ आसमान के ठेकेदारो अब तो समझो, आप की खातिर तो हमने अपनी उम्मींदो का आसमां लुटा दिया, क्या मिलेगा हमे चंद चमकीले से शीशे तोड के ।

Wednesday, February 9, 2011

एक्सटर्नल अफेर



मेरे एक दोस्त के प्रश्न ने मुझे बैचेन कर दिया है ईन दिनो। ये प्रश्न है...
क्या एक परणित स्त्री और परणित पुरुष मित्र नहीं हो सकते?

मैं क्या कहता ? मैं कोई ज्ञानी ,महात्मा ,या साधु तो हुं नहीं जो हर जगह अपनी ’ज्ञान-वाणी’ बाटता फिरुं| फिर भी मन बैचेन हो रहा था की आखिर इसका क्या जवाब देना चाहिए?
मैंने गुजरात के एक बहोत ही चर्चित लेखक चंद्रकांतबक्षी का एक लेख पढ़ा था। जिस मे उन्हों ने कहा था की “एक स्त्री और पुरष कभी मित्र नहीं हो सकते है ? यदि वो दावा करते हैं के वो अच्छे मित्र है तो या तो वो झूठ बोल रहे है, या फिर उनमें कोई रिश्ता नहीं है”| इस विधान से मैं सहमत हो जाउं या नही, ईसी पसो पेश मे मैं कब से चल रहा था। चलिए अब इस पर अपनी ’ज्ञान-सरिता’ बहाने की कोशिश कर के देखता हुं। ( जैसे की आज कल ’ज्ञानीलोग’ न्यूज़ चेनलो पर’ जा के करते हैं) ? शायद जवाब मिल जाये।

मैं यहाँ कोई गर्लफ्रेंड या बॉय फ्रेंड की बात नहीं कर रहा हुं, और न ही कोई लफ़डेबाजो की बात करने वाला हुं| मैं यहाँ एक रिश्ते की बात करने की कोशिश करना चाह रहा हुं।इसी रिश्ते की बात से संबधीत एक बात याद आ रही है, एक बहुत ही मश्हुर पत्रकार को किसी ने पुछा था की "आप के और आप की चेनल के एंकर के बिच में क्या लफड़ा है?जब की आपकी तो शादी हो चुकी है। जवाब में उन्हों ने कहा की " मेरे और उसके बिच में एक रूहानी रिश्ता है, हम दोनों के बिच एक डीप रिलेसन शिप है”|

जहाँ तक मेरा मानना है वहां तक मैं ऐसे रूहानी रिश्तों को शादी से कम पवित्र नहीं मानता । समाज को भी ऐसे रिश्तो को स्वाभाविक तौर पर स्वीकार कर ही लेना चाहिए , नहीं तो आने वाले दिनों में समाज नाम की पुरी व्यवस्था पर एक सवालिया निशान खड़ा हो जायेगा?वैसे भी पहले के भारतीय दौर मे राजाओं की कई सारी रानिया होती थी, हिदु देवी देवताओ के कई रिश्ते होते थे फिर भी उन्हें आज भी भगवान् ही माना जाता है| उनके खिलाफ कभी किसी ने प्रश्न नहीं खड़े किये? क्यों? ( क्यों की भारतीय समाज दंभ से भरा हुआ है|) पुरे विश्व को "काम-सुत्र" भारत ने दिया फिर भी आज भारत मे सेक्स पर बात करना वर्जित है ( ये बात और है की भारत की आबादी दिन-बा- दिन बढती ही जा रही है|) मेरी ऐसे सभी भारतीयों से अनुरोध है की कृपा करके दंभ छोड़े और परिवर्तन की लहर को महसुस करे | समाज के हरेक रिश्ते को आदर सामान दे|

बात आगे बढातें हैं..जिनके कोई विवाहोतेर संबंध हो ही नहीं शकते ऐसे कई भले मानुसों और सज्जनों को मैंने ऐसे रिश्ते बनाते और बाकायदा पुरे जीवन भर निभाते देखा है| उन्ही को फ़िर बोलते भी सुना है की " क्या होगा इस देश का ? इस समाज का ? आज कल लोग शादी के बाद भी दूसरी औरतो और पुरषों से संबंध कैसे रख सकते हैं? ये देश विनास की तरफ जा रहा है? में ऐसे महापुरषों और स्त्रियो को वंदन कर आगे बढ़ चलता हुं|

ऐसे रिश्तो को देख मेरे मन में एक प्रश्न स्वभाविक हो उठता है की स्त्री पुरुषो को अपने संबंधो को चुपके से शरमाते शरमाते भी निभाना क्यों पड़ता है? क्या प्रेम कोई गुनाह है? कया शादी करने के बाद किसी को कभी प्यार नहीं हो शकता? और क्या एक साथ दो व्यक्तिओं से प्यार नहीं किया जा सकता या निभाया नहीं जा शकता? मेरी निगाह में तो ऐसे प्यार करने वालो को और खुल के समाज के सामने आने वालो को आदर की नजर से देखना चाहिए| ऐसे रिश्ते रखने वालो को जो परेशान करता है या निंदा करता है वो मेरी नजर में एक बलात्कारी है,जो किसी अच्छी चीज को देख कर खुश नहीं हो शकता |( वैसे भी भारत का पौराणिक इतिहास रहा है जब भी कोई हवन करता है तो उस मे हड्डीयां डालने वाले आ ही जाते थे,और वो कौन होते थे ये मुझे बताने जरूरत महसुस नहीं होती आप सब को पता है। आज के समय मे सिर्फ उनका रोल और कार्य बद्ल गया है।) ऐसे कर्म करने वालो का खुल कर विरोध करना चाहिए | और जैसे भारत देश में बक-बक हर कोई करता है किन्तु करता कुछ नहीं वैसे अगर आप में और हम कुछ न कर सके तो ऐसे रिश्तो को कम से कम सम्मान की नजर तो बक्श ही शकते है | अगर ऐसा किया जाये तो वो ही मेरी नजर में सच्चा वलेनटाइन गिफ्ट होगा इस भारतीय समाज को|

अच्छा अब चलता हुं बहोत हो गया ...
जाते जाते इस कहानी के अनुरुप गुलजार साहब का इक शेर सुन लिजीये

कब्रिस्तान है, कब्रिस्तान से आहिस्ता गुजरो, कोई कब्र हिले ना जागे, लोग अपने अपने जिस्मो की कब्रो में बस मिट्टी ओढे दफन पडें है।

सुचना : में शादीसुदा नहीं हुं | मेरा कोई एक्सटर्नल अफेर भी नहीं है|

Friday, December 24, 2010

माँ तरकारी बना रही है…



कांपते हुए हाथ, फटे हुए पन्ने , मरते हुए जजबात, हिलती हुई कलम लिए, उम्र अपनी अब कट रही है खुद को साबित करने में, कौन समझेगा मेरी बेबसी का मतलब, निकला था पत्रकार बनने दलाल बन कर रहगया|
चलिए छोडिये अब इन बेकार की बातों को, आइये आज कुछ समय निकाल कर मेरे साथ,आप को बनते भारत की तस्वीर दिखता हूं...

रात का वक्त है, बहोत ही खामोश सन्नाटा है, कोई साया,सर्गोशी और आहट नहीं है| बस एक मकान की ओर से धीमी सी रोशनी टिमटिमा रही है| फटे हुए खस्ताहाल टाट के पर्दों से चाँद की मनभावन किरणे एक घर में हौले से झांक रही है| छोटे से इस घर में हजारों किस्म के धुंए के बीच जलता, सुलगता हुआ एक छोटा सा परिवार ‘खुशहाल’ दिखाई दे रहा है| कई वर्षो के लगातार इन्तजार के बाद आज इनके घर में चूल्हा जल रहा है, आज इनके घर में ‘तरकारी’ प़क रही है| घर से बहार की ओर सीना ताने भागता हुआ धुआं भी आज अपने आप पर इठला रहा है| आज तरकारी की महक से मुरझाये चेहरोवाले बच्चों की नाक तरकारी की महक से लप-लपा रही है| शायद ये आज गर्व से कह या सोच रहे हैं “अमीरों के घर में तो रोज बनते है पकवान आज हमारी माँ भी तरकारी बना रही है"| इन मासूमों को क्या मालूम आज इनका पिता अपने आप को बेच आया है। बच्चों के पेट की आग मे पत्नी का मंगलसूत्र झोंक आया है। चलिये जाने भी दीजिये इन बोरिंग बातों को आगे चलते है.....

कहीं से आ रही है आरती की आवाजें तो कहीं नेताजी पार्क में चिल्ला-चिल्ला "गरीबी हटाओ"का नारा लगा रहे हैं| कहीं मल्टीप्लेक्सों में लम्बी लाइने लगी है तो कहीं बाइक और मोटर फर्राटे से भागे जा रही है,हर कोई एक अनजानी सी अंधी दौड में शामिल है,पता नहीं कहां जाना है,कब तक ऐसे ही भागते भागते जीवन बिताना है? इन सब भागदौड को नजरअंदाज कर ये बच्चे खुश हैं, आज इनकी माँ ‘तरकारी’ बना रही है|

बनते भारत में लाखों लोगो को ‘सुगर’ सता रही है, वहीं इन लोगों के घर में रखे चीनी के डब्बो ने वर्षों से ‘सुगर’ का एक दाना तक नहीं चखा | बडे-बडे होटलों, बसों ,मेट्रो, से शहर भरा जा रहा है, बढ़ते, फलते-फूलते इसी शहर में इन्होंने खाली पेट ( खली का पेट नहीं) कई रातें गुजारी है| चीज नान, बटर नान,पालक-पनीर,पिज्जा, बर्गर को इन्होंने सिर्फ अपने ख्वाबों-ख्यालों में ही महसूस किया है, और इन नामों का आनंद सिर्फ इनके कानों ने लिया है| बाकी इन्होंने तो कई रातें रोटी के सिर्फ एक टुकडों में गुजारी है| इन सब फ़िजूल बातों का क्या मतलब, आज तो इनकी माँ ‘तरकारी’ बना रही है|

बहुत ज्यादा हो गया, आँखे बंध करिए चुपके से मेरे साथ आप भी आगे बढ़ चलिए. ..

चमचमाती हुई पानों की दुकानें, दिन-ब-दिन बनते फ्लाय-ओवर, बढ़ते हुए मोल जहाँ हर समय खरीदारों का मेला लगता है, वहीं एक अंधियारे से कोने मे झांकती चाँद की किरणे हरदिन इन मासूम से बच्चों को चिढ़ाने आती थी, आज इन बच्चों को मुस्कुराते देख वे भी खिसिया के भाग रही हैं, आज इनकी माँ ‘तरकारी’ बना रही है|
हर रोज हर समय विकसते हाई-वे के कई कोनों पर यहाँ रोज ’सतीत्व’ बिकता है, हर रोज यहाँ कुंती रोती है, रोज यहाँ सज सवंरकर निकलती है राधा किसी कृष्ण के लिए ,सुबह होते ही इनका कृष्ण बदल जाता है| हर सुबह इसी शहर में बनते बिगड़ते हैं रिश्ते, हर बेड़ पर किरदार बदल जाता है| ऐसे माडर्न कल्चर का गरीबी से जुझ रहे इस परिवार के जीवन पर कोई असर नहीं दिखाई देता, इनकी माँ तो बरसों से “थैली” के नशे मे रंगे कृष्ण को निभा रही है | ऐसी और ना जाने कितनी गर्वशील व्याधियों को भूल आज खुश है ये मासूम से फूल, क्योंकि आज इन की माँ ‘तरकारी’ बना रही है|

रोज की तरह हर सुबह की किरणे एक नयी आशा इन भूखे नंगे लोगों के लिए लाती है| क्या फर्क पड़ता है अगर गरीबी का अर्थ अब सिर्फ लाचार,बेबश गरीबों की तस्वीरों में नजर आता है|
हर वख्त मैं यही सोचता रहता हूं कि क्या यही आजादी और विकास का अर्थ है? कया यही ग्लोबलाइजेशन है? कया इसीलिए तडपी थी भगत सिंह की लाश? क्या इसीलिए गाँधी ने अपनी जान गवाई थी?
अब मुझसे लिखा नहीं जाता क्योंकि जितना मैं इन सवालों को रोशनी देने की कोशिश करता हूं उतना ही मेरा खून गर्म होता जा रहा है| कागज भी अब फटने लगा है,कलम भी अब कांपने लगी है| अब भूल जाना चाहता हूं ऐसे बुरे और टी.आर.पी. लेस खयालों को। इन सबसे मुझे क्या? क्योंकि इनकी माँ आज ‘तरकारी’ बना रही है|

जाते जाते:
विकास की इन मंद मंद लहरों को गरीबों के घर को भी छू लेने दो|
चन्द अमीरों और शहरों तक अगर यह सीमित रह जायेगा,
तो वो दिन दूर नहीं जब ’विकास’ भी गर्व से 'दलाल' कहलवायेगा ||

Tuesday, December 7, 2010

बदलते दौर का अदाकार-पत्रकार...



एक पत्रकार हुं मैं, हाँ बदलते दौर का एक अदाकार हुं मैं |
जिनी पड़ती है कई जिंदगिया इसी जीवन मे, हररोज डेस्क पर मेरा किरदार बदल जाता है|
मैं हालात तो बदल शकता नहीं लिहाजा मेरी आदत बदल जाती है|
दाग नहीं छुटते मेरी पोशाको से इसी लिए औरो की पोशाके दागदार बनाता हुं मैं |
दबे कुचले किरदारों की लाशो पर अपना आशियाना सजाता हुं मैं |
हाँ बदलते दौर का पत्रकार हुं मैं..
कोई दर्दनाख किरदार गुजरता है जो आँखों के सामने से तो आँखे बंध कर जरा सा शरमाता हुं मैं |
न जाने कितनी दर्दनाख कहानिया दफ़न है सीने मे फिर भी जीवित किरदारों को भूल,भूत-प्रेत की कहानिया चलाता हुं मैं |
जिंदगी की यहाँ कोई कीमत नहीं फिर भी कीमत की आश मे न जाने कितनी जिंदगिया बिगाड़ता हुं मैं|
हाँ बदलते दौर का पत्रकार हुं मैं..
सच को झूठ झूठ को सच बनाकर अपनी रोजी रोटी चलाता हुं मैं,
न जाने कितनो की रोजी रोटी छीन बॉस के सामने कमीनो सा मुस्कुराता हुं मैं|
शकल पर लगवा के " Story Approve" का ठप्पा एक सच्ची राह पर चल रहे को भटकाता हुं मैं |
हर रोज वतन, वेतन और सियासत से जूझता हुआ अपने फुल से कोमल परिजनों की जिंदगिया झुलसाता हुं मैं|
T.R.P. की टक-टक मे प्रेमिका की धक् धक् भूल जाता हुं मैं ,
बच्चो के खिलौनों को भूल " Edit suit " मे एनिमेसन बनाता हुं मैं|
हर पल लौट जाऊंगा अपनी जिन्दगी मे यही सोच मीठे सपनो की दुनिया मे सो-खो जाता हुं मैं ,
शायद वहीँ मिले मेरे सपनो का जहाँ वहीँ फुर्सद के पल बिता पाता हुं मैं|
हाँ बदलते दौर का पत्रकार हुं मैं ...

Tuesday, November 16, 2010

|| क्योंकी ये भारत देश है ||



एक चलती गाड़ी में बैठा था गाड़ी चलती जा रही थी साथ में मेरा मन भी बावला हो रहा था,मन मचल रहा था|भारत देश के कई रंग इन्द्रधनुष की तरह सामने आ रहे थे| कई रंग काले थे तो कई रंग सफ़ेद भी थे तरह तरह की दुनिया और रंग सिर्फ मेरे भारत में दिखाई दे रहे थे मैं सोचता और लिखता चला गया आप को पसंद न आये तो कृपया क्षमा करिए|

ये मेरे भारत देश में ही होता है मेरे दोस्तों ,एक औरत की कोख से हमेशा "बेटा" पैदा करने की दुआ मांगी जाती है|
एक श्याम रंगी औरत या आदमी हमेशा सफ़ेद रंग की चाह्त रखता है क्योंकी ये भारत देश है|विदेशो में जा कर बसता है और अपने आप को विदेशी कहलवाता है लेकिन शादी तो भारत में ही आकर करता है क्युंकी ये भारत है,और हम सब भारतीय है|

माइकल जेक्सन के गानों को अपनी गाडी में जोर जोर से बजाता है सब को दिखता है की वो कितना आधुनिक है पर घर जाते ही कोने में चोरी छुपे,नेट से या सी.डी लगाकर हिंदी फिल्मो के या भोजपुरिया गाने सुनता है क्योंकी ये भारत है|भारत में आकर विदेशो में सडको और साफ़ सफाई की सब के आगे बीन बजाता है और खुद भारत आकर सडको पर थूकता है जहाँ तहां कचरा फैकता है क्योंकी ये भारत है| अपनी माँ और बहन को छेड़ने वालो के रकत बहाता है लेकिन दुसरो की माँ बहन छेड़ते वखत ये भूल जाता है की उसके घर में भी माँ बहन है क्योंकी ये भारत है | भारत में आये अमरीका के नेता ओबामा को भारतीय नेता सिर-आँखों पर बैठाते है ,और जब खुद अमरिका जाते है तो नंगाझोरी देकर आते है क्योंकी ये भारत है |

न्यूज़ चेनलो पर सास बहु के धारावाहिक और सास बहु की चेनलो पर न्यूज़ दिखाये जाते है क्योंकी ये भारत है|
यहाँ टी.आर.पी. के तर्ज पर लोगो की जाने जा रही है और उन्ही की चेनलो पर टी.आर.पी. की हाय तौबा मचाई जा रही है क्योंकी ये भारत है| भ्रष्टाचार दिनों दिन बढ़ता जा रहा है उसको रोकने के लिए भी यहाँ रिश्वत दी जाती है क्योंकी ये भारत है| भारत को युवा और युवा राजनीत की जरूरत है ये मंच पर चिल्लाता नेता खुद ५० साल से हिलता नहीं औरों को युवाओ के बारे मैं समझाए जा रहा है क्योंकी ये भारत है |

लंबे लंबे भासण का विरोधी खुद ही लम्बा लम्बा लेख लिखे जा रहा है क्योंकी ये भारत है|

Saturday, October 23, 2010

॥ अंधेरा ॥



हर बंधनों से मुक्त हो कर अपने खंडकाल में अकेला बैठा हुं ।
अखंड एकांत को संजोये अपने आप में ही छिप कर बैठा हुं ॥

शाम की ठंडी हवा का झोंका मेरे लिए रेशमी तन्हाई लाता है ।
मखमली अँधेरा मुझे अपनी बाँहों में समेट कर आँखे मींच लेता है ॥

सारी खिड़कियाँ खोल बंध दरवाजो के बिच जीना मुझे अब अच्छा लगता है,
मेरे आसपास रचा हुआ शांति का सरोवर मुझे अब अच्छा लगता है॥

अब कमल अपने आप ही खिलते है, और भवरें भी अपने गीतों को होठों पर सिले हुए,
मेरे एकांत की हौशला अफजाई करते है ॥

न जाने कौन सा अनदेखा अनजाना लुत्फ़ उठा रहा हुं अपने मन के कोने में,
होश से बेहोश होने की मजा ही कुछ और है ॥

भाव- अभाव- प्रतिभाव- प्रत्याघात- अपेक्षा-उपेक्षा- अब कुछ भी मुझे बाधित नहीं करता ।
अपनी ही आवाज से दूर हो कर अपने ही मन से मौन धारण करता जारहा हुं ॥

गाने गुनगुनाने वाले कई गीतों को अलविदा कह कर अपने आप में ही खोता चला जा रहा हुं ॥

Monday, October 11, 2010

क्यां तुम्हे भी याद है..



कुछ बातों की शुरुआत मुझे अभी भी याद है ,
साथ गुजारे वो हर लम्हे , वो हर पल अभी भी मुझे याद है |

यादो की सिलवटें अभी भी दिल की तन्हाई में दफ़न है,
तुमसे लड़ना झगड़ना अभी भी मुझे याद है |

आधे अधूरे अंत की मुलाक़ात मुझे याद है,
तुम न जाने कौन से कोने में छिप गई हो,

तुम्हारा अभी भी छिप के चाँद की तरह सामने आना याद है |

मेरे गम की तन्हाई में वो तुम्हारा फूलों सा मुस्कराना मुझे याद है |

हर हँसते चेहरे में एक हसीन सा चेहरा मुझे याद है |

दरिया में तो आती है मौजे बहार, किन्तु किनारों को तो सिर्फ रेत पर छपी पैरो की परछाई याद है |

मेरे दिल में है आप का एहसास , क्या आप को भी याद है ?

तुम को याद कर हर वख्त आँखों से निकलते आंसू, मुझे तो याद है, क्या तुम्हे भी याद है ?

तुम्हारे बिना कैसे गुजरती है मेरी रातें मुझे तो याद है, क्यां तुम्हे भी याद है?

Thursday, September 23, 2010

प्रेम का हो रहा आधुनिकीकरण या बाजारीकरण |


प्रेम पर बहोत कुछ बेचा जा रहा है,बहोत कुछ लिखाजा रहा है। युवानो को भरमाया भी जा रहा है बहकाया भी जा रहा है। आज कल प्रेम के नाम पर करोडो का व्यापर भी किया जा रहा है। इन सब भावनाओ और दुर्भावनाओ के बिच मे न जाने मैं कहा खोता जा रहा हूँ।आखिर ये प्रेम चीज है क्या। क्या सचमुच प्रेम जैसी कोई चीज है भी के नहीं?

मैं अपने दोस्त की एक बात बताना चाहुंगा जिसे मैं कई दिनों से या यूँ कह ले के पिछले कई वर्षो से जानने की कोशिश कर रहा हूँ। वो हमेशा मुझे प्यार-व्यार की बाते कहता सुनाता रहता है। वो एक लड़की से बहोत प्यार करता है। उसका ख्याल भी रखता है। वो कहाँ जाती है, क्या खाती है, क्या पहनती है, और कैसे चलती है वगेरह वगेरह और हा घंटो फ़ोन तो चलता ही रहता है ( वो भी सदके में) कहानी ये नहीं है।

कहानी ये है की फ़ोन वो उसे हमेशा इस लिए करता रहता है की शायद कोई और उससे बतिया ले। उससे हमेशा ये इस लिए पूछता रहता है की कहा हो “जानु” ताकि उसे ये पता चल शके की कहीं वो किसी और के साथ तो नहीं। उसे हमेशा अपनी पसंद के कपडे इस लिए पहनाता है ताकि उसे पता चल शके की उसकी प्रेमिका उसका कहना मानती है या नहीं। और ऐसी कई बाते है जो मैं यहाँ नहीं लिख शकता। लेकिन इन सब के बावजुद वो हमेशा मुझसे और सभी दोस्तों से यही कहता रहता है की वो बहुत प्यार करता है। दिलो जान से चाहता है अपनी गर्ल फ्रेंड को | भाई अगर यही प्यार है तो अच्छा है की मुझे अभी तक ऐसा नहीं हुआ| मैंने अब ये क्सिसे आम होते देखे है। जो बहोत प्यार करने का दावा करते है वो एक दुसरे पर रति भर विश्वास नहीं कर शकते है। सीरी फरहाद के किस्से सुनाने वाले एक पराये लड़के या लड़की का मेसेज फ़ोन मे देख जन्मो-जनम का रिश्ता खतम कर देते है।

क्या कभी आपने ये सोचा है ये सब आज कल जायदा कयुं हो रहा है। मैंने सोचा है,शायद मैं गलत भी हो शकता हूँ । लेकिन मुझे लग रहा है की आज कल प्यार पर बाजार वाद हावी हो रहा है। अपनी प्रेमिका को खुस करना हो तो ये गिफ्ट दीजिये,फला-फला त्योहार आ रहा है ये गिफ्ट दीजिये नहीं तो आप की प्रेमिका या प्रेमी नाराज हो शकते है। आप को अपने प्रेम पर शक है तो “इमोशनल अत्याचार” हाजिर है आप के प्रेम की परख करने के लिए। आप को आप के प्रेम ने छोड़ दिया है तो “x यौर x” हाजिर है आप के प्रेमी को सजा दिलवाने के लिए | गोबेल्स की एक निति मुझे यहाँ याद आ रही है " झूठ जोर से बोलो बार बार बोलो चिला के बोलो तो वो सत्य तो हो ही जायेगा" उसी लिहाज से आज कल प्रेम पर बाजार वाद इतना हावी हो रहा है की प्रेम गायब और सामान जायदा बिक रहा है। इस लेख को पढ़ जायदा बोर मत होइए नहीं तो आप की गर्ल फ्रेंड या बॉय फ्रेंड नाराज हो जायेंगे। दुनिया है होता रह्ता है .. बडे बडे देशो मे छोटी छोटी बाते होती रहती है........

Tuesday, August 24, 2010

|| चोला टी.आर.पी. का ||



सुबह के लगभग ७ बज रहे थे हम लोग गुजरात और मध्यप्रदेश के बोर्डर रतनमहल जाने के लिए निकल चुके थे| वैसे सुबह-सुबह कई सारे मेसेज आते है लेकिन एक मेसेज जो गुजरात के ही एक छोटे से प्रान्त उंझा से आया था उस ने मेरा ध्यान खीचा|

मैंने मेसेज पढ़ा और तुरंत ही मेसेज करने वाले मेरे मित्र को फ़ोन लगाया। सामने के छोर से वो लगातार बोले ही जा रहा था उस की बात जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी वैसे-वैसे मेरे रोंगटे खड़े होते जा रहे थे | फोन करने वाला मेरा मित्र बता रहा था की कैसे दो पत्रकारमित्रो ने एक एक्सक्लुसिव घटना के लिए एक कहानी रची थी जिस मे उन्हों ने एक निर्दोष व्यक्ति की जान ले ली।

बात कुछ यों है की उत्तर-गुजरात के ही एक इलाके मेहसाना से कुछ किलोमीटर दूर उंझा नामक एक शहर है जो ज्यादातर अपने “जीरा” निकास और विकास के लिए जाना जाता है। हाल ही मे हुये उमिया महोत्सव की वजह से भी उंझा का नाम सारे विश्व मे गूंजा था | फिलहाल एक बार फिर उसका नाम पुरे देश मे गूंजा है अच्छी वजहो से नहीं बल्की देश के चौथे स्तम्भ की गलत कारनामों की वजहों से। चलिए विषय भटकाव हो रहा है मुख्य बात पर आते है, बात उंझा की है दो पत्रकार मित्रो को उनके डेस्क से लगातार कुछ नया या एक्सक्लुसिव देने के लिए फ़ोन आ रहे थे। वो भी लगा तार दबाव से तंग थे। सो कुछ नए की तलाश मैं थे। ऐसे मैं उनको एक व्यक्ति का मदद के लिए फ़ोन आया( जो अपने परिवार के प्रोपर्टी के झगड़ो की वजह से परेशान था| उन पत्रकारों के दिमाग की काली घंटी बज उठी| जो उन्हें सही दिशा मे बजानी चाहिये थी वो गलत दिशा मे बजायी|

उन्हों ने उस व्यक्ति को इक विचार सुझाया की ऐसे कुछ नहीं हो पायेगा हम कह रहे है ऐसे करो तो तुम्हारी कुछ न्यूज़ बनेगी और तुम्हारा काम हो जायेगा | उन्हों ने उस व्यक्ति को सुझाव दिया की तुम उंझा पुलिसथाने जा कर आत्मविलोपन की धमकी दो और न माने तो खुद पर मिटी का तेल छिडक लो और माचिस लगा लेना हम लोग वहीं रहेगे तुम जैसे ही थोड़े जलोगे हम लोग आकर बचा लेंगे| वो बिचारा आफत का मारा उन की बातो मे आ गया और वैसे करने को तैयार हो गया| हाथ मे मिटी का तेल लिए पहोच गया पुलिसथाने उसने उन पत्रकारों ने जैसी स्क्रिप्ट टाइप की थी बिलकुल वैसे ही किया | उसे कहाँ पता था था आज कल के पत्रकारों के बारे मे,और आज के पत्रकारिता के बारे मे | उस ने जैसे ही मिटी का तेल अपने जिस्म पर छिड़का की हालफिलहाल मगरमच्छ की तरह मुह फाड़े खड़े पत्रकारो के केमरे रोल हो गये। उन्हों ने उस आदमी को दगा दिया उसे बचाने की बजाय सुट करने लगे थोडी देर तक वो जलता रहा जब उन दोनों ने सुट करना बन्ध नहीं किया तो अगल बगल के कुछ लोग दौड़े और उसे बचाने के प्रयास किये | उसे जबरन हॉस्पिटल पहोचाया लेकिन जबतक वो हॉस्पिटल के दरवाजे पर जा कर जीवन के लिए दस्तक देता तब तक उस के प्राणपंखेरू उड़ चुके थे| और उन पत्रकारों की स्टोरी फाइल हो चुकी थी|
ये लिखे जाने तक जिन पर उस मासूम की जान लेने का आरोप है वो “पत्रकार” फरार है। पुलिस ने उन दोनो पत्रकारो के खिलाफ़ आत्म हत्या के लिये उक्साने के आरोप लगाते हुए एफ़.आइ.आर दर्ज कर ली है। और इस घटना के प्रत्यक्षदर्शीओ ने भी अपने अपने बयान दर्ज करवा दिए है।
अब इस घटना के दस दिन बाद चर्चा हो रही है की क्या ये गलत था या वो गलत था|( शायद पहले हमारे मीडिया के बोस लोगो को ईस मे टी.आर.पी. ना दिखी हो जो अब दिख रही है।) जो भी सही गलत हो उसका फैसला तो हमारी न्यायपालिका करेगी लेकिन उस बिचारे का क्या जिस ने एक एक्सक्लूसिव मैं अपनी जान गवा दी? इसके पीछे क्या सिर्फ वो ही दो पत्रकार जिमेदार है?? या फिर टी.आर.पी. की अंधी दौड़ मैं सामिल हमारे उच्च पदस्थ सारे बॉस जवाबदार नहीं है ? हर दिन कुछ नया हर दिन कुछ तडकता भड़कता??? कहा से आयेगा हर रोज तड्कता भड्कता? ऐसे ही आयेगा ना। अगर अब भी हमारे टी.आर.पी. वान्छुक मीडिया मंधाताओं की आँख न खुली हो तो आने वाले दिनों मे ऐसे किस्से आम हो जायेंगे | उन पर भी उन्ही चैनल्स पर आधे घंटे का कोई प्रोग्राम बनेगा और बस जवाबदेही ख़तम|

“चोला टी.आर.पी. का है, हे राम, अभी सभल जा हे मेरे यार,नही तो एक दिन आयेगी सबकी बारी।”

यहाँ पर लिखी सारी बाते घटनास्थल के लोगो द्वारा बताई गयी है ये गलत भी हो सकती है लेकिन उस निर्दोष ने जान गवांइ है,ये सच मिटाने से भी नहीं मिटेगा|

Saturday, August 7, 2010

बोये पेड बबुल का 'आम' कहा से होय.??



आप कोई भी समय कोई भी चैनल लगा लीजिये कहीं न कही आप को लुट,बलात्कार, खून, चैन स्नेचिंग की घटना पे डायन की तरह से जोर जोर से चिलाते या मिमियाते न्यूज़ एंकर दिख ही जायेंगे। कोई भी अख़बार उठा लीजये आप, तो आप को फ्रंट पेज पर लूट बलात्कार से भर हुए कोलम मिल ही जायेंगे। क्या आप ने कभी इस के पीछे क्या और कौन जिमेदार है ये सोचने की कोशिश की है( मैं आधे घंटे का प्रोग्राम भरने की बात नही कर रहा। ) कुछ दिलो दिमाग से सोचने की बात कर रहा हूँ.|

एक ऐसी सोच की जिस से समाज मे और उस तकलीफ मे कुछ सुधार आ सके। आप Mtv लगा लीजये कभी न कभी आप को स्टंट मेनिया का प्रोमो या प्रोग्राम दिख ही जायेगा,जिस मैं नव युवा लड़के लकडिया आप को जान जोखिम मे डाल कर स्टंट करते दिख जायेंगे। और उन जोखिमो का प्रमोसन भी खूब प्रभावी ढंग से किया जाता है। फिर बारी आती है हमारे न्यूज़ चेनलो की हर रोज एक पैकेज बन जाता है, दिल्ही की सड़क पर छाया बाईकर्स का आतंक, फला फला जगह पर हुआ “हिट एन्ड रन केस” ( भैया मैं पूछता हूँ की एक तरफ आप स्टंट मेनिया कर के नौ जवानो को उकसा रहे हो दूसरी तरफ जब वो आप के उकसावे पर पूरी तरह तैयार हो जाते है तब आप उन्ही पर खबर बना देते हो|वाह रे हमारा मीडिया समाज)

सिगरट और तम्बाकू का आविष्कार किस ने किया ? हम ने| फिर उस पर बड़े बड़े चित्र भी हमने ही लगाये की सिगरेट पीना स्वास्थ के लिए हानी कारक है। कैंसर भी हमने पैदा किया और उससे बचने की दवा भी हमने ही बनाई है। मेरा प्रश्न सिर्फ इतना है की जिस गढ्ढे को आप ने खोदा है अगर उस मे आप गिर जाते हो तो फिर इतना शोर-शराबा क्यूँ मचाते हो ??? भाई ये तो वो बात हुई कि चोर को कहिये की चोरी कर और फिर चिलायिए चोर चोर.....!

आज कल हर जगह “सप्लिट्स-विला” और “ट्रुथ लव केस”( MTVऔर VTV के प्रोग्राम है।) की चर्चा है। दूसरी तरफ चर्चा ये भी है की आज कल भारतीय समाज में शादीया जल्दी टूट रही है। लोगो के शादिओतर संबध मे दिनों-दिन बढ़ावा हो रहा है, मैं पूछता हूँ की एक तरफ तो आप “सप्लिट्स-विला” और “ट्रुथ लव केस” मे प्यार मे गद्दारी करना सिखाते हो और जब वो ही चीज समाज पर हावी होने लगती है तब चिलाते हो। ऐसी परिसिथिति का निर्माण ही क्यूँ किया की जो समाज के लिए खतरा बन जाए। ( शायद फिर ये आधे घंटे का शो कर के प्रोग्रामिंग चेनल की टीआरपी नहीं आती ऎड नही मिल्ते। )

हम ही स्टोरी चलाते है की क्रिकेट को ज्यादा अहमियत दी जाती है भारत के अन्य खेलो को नहीं|( अरे प्राइम टाइम मे क्रिकेट पर आधा घंटा, क्रिकेटरो की लाइफ स्टाइल पर घंटो के प्रोग्राम कौन चलता है ? और किसी खले पर कोई स्पेशल प्रोग्राम नहीं बन शकता क्या...!) क्राइम पर सनसनी और न जाने क्या क्या बनाते है हम,आप और हमारे मीडिया के मित्र और फिर चिलाने वालो मे भी हम आप और वो ही है की देश मे क्राइम बढ़ रहा है। हमारे भुतपूर्व राष्ट्रपति कब से कह रहे है की “पोसिटिव पत्रकारिता” करो खेती पर कार्यक्रम बनाओ। उन्ही के शब्दों की दुहाई देते न्यूज़ चनलो से मेरा प्रश्न है की आप ने कब उनकी बात मानी और ऐसे न्यूज़ चलाये.! क्या पोसिटिव पत्रकारिता नहीं हो सकती? ( हो शक्ति है लेकिन टी.आर. पी. जो नहीं आती ऐसे प्रोग्रामस की | पिपलो मीटर जो नहीं लगे होते ऐसे क्षेत्रो मैं|)
बात यही पर आकर नहीं अटकती आज कल एक नया फेशन चला है बन बैठे विवेचको मे, कुछ भी हो कैसे भी गुनाह हो घुमा फिरा कर नौजवानों के सर मढ़ दो, किसी न्यूज़ चैनल पर जा के “बाईट” दे दो काम ख़तम। ( विवेचन का नया तरीका)

आज कल सभी पानी मथ कर दही निकाल रहे है। लेकिन लोगो को पता नहीं चलने देना चाहते की वो पानी मथ रहे है। सब को दिखा भी रहे है और दिलशा भी दे रहे है की धैर्य बनाये रखिये हम लोग दही मथ रहे है इस में से माखन निकलेगा वो आप सब को ही देंगे।

मेरा ये प्रश्न उन सभी लोगो से है की जो हमेशा ये प्रश्न उठाते रहते है की पोलिटिक्स से अच्छे लोग दूर रहते है। वोट नहीं करते बला बला बला...। मेरा प्रश्न उन सब से है की उनको वोटिंग तक खीच लाने के लिए आप ने क्या किया?????

चलिए अब भासण बाजी और लेक्चर बहोत हो गया, मैं भी कुछ नहीं कर पा रहा इन सब के लिए या मैं भी कुछ नहीं करना चाह रहा सो यहीं अपनी भड़ास निकाल दी ( या दुनिया को मैं भी ये दिखने की कोशिश कर रहा हूँ की मैं भी अब विवेचक हो गया हूँ | या मेरी भी गणना अब बौधिको मे होनी चाहिए।)

बाकि क्या है ये संसार एक मोह माया है क्या लेकर आये है और क्या लेकर जायेंगे|( न्यूज़ बुलेटिन लेकर आये थे टी.आर.पी. लेकर जायेंगे|)

Tuesday, July 27, 2010

|| चल रे मनवा रेल वे ट्रेक ||



कुछ दिनों पहले ही मैने भारत की एक अजायबी भरी सेवा से भारत की ही एक दुसरी अजायबीओं से भरी दुनिया देखी। भारतीय रेल की “राजधानी” से भारत की राजधानी की और जा रहा था। सुबह का वख्त था, ट्रेन मे और कुछ काम तो होता नहीं, लिहाजा जो मेरे जीवन मे बहोत कम होता है वो हुआ, मैं सुबह जल्दी उठा। प्रक्रुति के नजारे आँखों को खुब लुभा रहे थे। धीमे धीमे ट्रेन आगे बढ़ रही थी,वक्त गुजरता गया और रेल्वे ट्रेक की तरह पृकृति के नजारे आँखों से ओझल होने लगे थे। ट्रेन के नीले कांच के अन्दर से रेल्वे ट्रेक के किनारों की एक नई दुनिया की झांकी झांक रही थी। वो कुछ ऐसी दुनिया थी जिसे देख कर मैं हैरान हो गया।

सुबह उठते ही बाथरूम का दरवाजा खोलने की आदत शायद सबको है। लेकिन रेल्वे के किनारे बसे लोगो की दुनिया मे शायद ये नसीब नहीं है। खुला आसमान ही उनका बाथरूम है और रेलवे ट्रेक ही उनकी दिनचर्या सुरु करने का स्थान। एक दिन अगर घर मे पानी नहीं आता तो मैं व्याकुल हो जाता हूँ,लेकिन इन्हें देख कर ये प्रश्न हुआ की ये लोग पानी कहा से लाते होंगे ? सोने के लिए मुलायम गद्दे हमेशा मेरा इंतजार करते है जिनके बिना मुझे कभी नींद नहीं आती, वोही एक छोटे से मासूम को रेलवे ट्रेक के कंकडो पर सोते देख मुझे सारे सुख याद आने लगे। सोने के लिए पिन-ड्रोप सायलंस की आवश्यक्ता शायद मुझे हमेशा रहती है। लेकिन एक बुजुर्ग को रेल्वे से एक दम सटके अपनी चारपाई डाल कर एक दम शोर-शराबे के बीच आराम से सोते मैंने देखा। २० बाय २० का कमरा भी मुझे हमेशा छोटा लगता था, लेकीन १० बाय १० के कमरे मे कई लोगो को रेल्वे के किनारे आराम से रहते देखा। १० मिनिट भी चाय मिलने मे देरी हो जाय तो घर मे मैंने चिल्लाते हुए लोगो को देखा है। लेकिन रेल के इस किनारे कईओ की सुबह बिना चाय के होती मैंने देखी। अलार्म से हमेशा नींद को त्यागने वाला मै ये सोच कर दंग रह गया के रेल्वे के ईन्जन की सिटी न जाने कितनो का एलार्म है। कितनो की सुबह सिर्फ उसकी एक आवाज से होती है।
मुझे सुबह होते ही अखबार और देश की चिंता सताने लगती है लेकीन पहली बार रेलवे के किनार लोगो को सुबह उठ कर सिर्फ खाना कहाँ से आएगा ऐसी चिंता करते देखा। लोग जितना जल्दी हो उतना जल्दी इन रेलट्रेक वाले अपने घरो को छोडना चाहते थे,वंही मेट्रो के किनारे हजारो रुपियो का इत्तर लगाये लड़के लडकियों को घंटो बतियाते भी मैंने ही देखा है.!

ऐ.सी कोच मे बैठ कर ठंडी का एहसास और आनंद लेते मैंने उसी कोच के बाहर गर्मी मैं झुलसते लोगो को देखा है ! न जाने मुझे क्या हो गया है जब से मैंने इस रेलवे ट्रेक को देखा है। जैसे रेलके दो ट्रेक आपस मैं कभी नहीं मिलते वैसे मेट्रो और रेल्वे ट्रेक की आसपास की संस्कृति भी शायद आपस मैं कभी नहीं मिल पाएगी...! न जाने मुझे क्या हो गया है जब से मैंने रेलवे ट्रेक को देखा है.!